✍️ डाॅ. कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
जीत–हार का तजुर्बा अजीब होता है,
जीत पर सारी दुनिया गले लगाती है,
हार के बाद तो नज़दीक नहीं आती,
बल्कि अनावश्यक मुँह चिढ़ाती है।
असफलता पर कोई साथ खड़ा हो,
कंधे पर प्यार भरा हाथ रखा हो,
वही तो एक सच्चा मित्र होता है,
अन्यथा तो स्वार्थ का साथ होता है।
संत से पूछिए क्रोध क्या होता है,
उसका उत्तर होगा—यह वह दंड है,
जो दूसरों की गलती पर भी,
मनुष्य स्वयं को ही देता है।
हम बड़ा होने का प्रयत्न करते हैं,
पर अक्सर यह भूल जाते हैं,
जिसने हमको बड़ा बनाया है,
हम उससे बड़े कैसे हो सकते हैं।
स्वार्थपरता का पता तो तब चलता है,
जब किसी के नज़दीक जाया जाता है,
स्वार्थहीन इंसान तो दूर रहकर भी,
अपनेपन का एहसास करा जाता है।
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