सत्ता की ताक़त और
ऐश्वर्य का अहंकार,
जीवन में मीठे फलों
की तरह स्थान पाते हैं।
पर प्रभुता पाकर इंसानियत
से इंसान दूर चला जाता है,
प्रभुता का अहंकार आख़िर
में नष्ट भ्रष्ट हो जाता है।
इसीलिये यह कहा गया है
कि मित्र और परिवार हमारे,
जीवन की सुखद, शान्त,
गहरी सी मज़बूत जड़ें हैं।
मीठे फल खाये बिना हम
निश्चित जीवित रहते हैं,
जड़ें अगर मजबूत नहीं तो,
नहीं खड़े भी रह सकते हैं।
अहंकार के मद में नीचे
इतना मत गिर जायें,
धरती माता से सुदूर हो,
नभ मंडल में मंडरायें।
शक्ति के मद में चूर चूर,
निर्बल को बल दिखलायें,
अपनी बनावटी ख़ुशियों से
औरों को दुःख पहुँचायें।
होशियारी इतनी न भली,
हमसे अपने ही छले जायें,
ऐसी ईर्ष्या प्रभु मत देना हम
खुद जलकर ख़ाक हो जायें।
अभिमान ज्ञान का मत देना,
कि पर उपकार भूल जाऊँ,
आदित्य यही विनती प्रभु से,
सच्चे पथ पर चलता जाऊँ।
•कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
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