पुनीत मिश्र
भारत के आधुनिक सैन्य इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो केवल अपनी पदस्थापना से नहीं, बल्कि अपने दृष्टिकोण और निर्णायक नेतृत्व से एक युग को प्रभावित करते हैं। जनरल बिपिन रावत ऐसा ही नाम हैं, एक सैनिक, एक रणनीतिकार और एक बदलावकारी नेतृत्व, जिन्होंने भारतीय रक्षा व्यवस्था के ढांचे को नई ऊर्जा और नई दिशा प्रदान की।
जनरल रावत की सैन्य यात्रा उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल से शुरू हुई और भारतीय सैन्य अकादमी से कमीशन प्राप्त करते ही उन्होंने अपने दृढ़, अनुशासित और जमीनी नेतृत्व का परिचय दिया। 11 गोरखा राइफल्स में सेवा के दौरान उनके कार्यों ने उन्हें एक सख़्त लेकिन मानवीय कमांडर के रूप में पहचान दिलाई। कश्मीर और उत्तर-पूर्व जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में उनके नेतृत्व में चलाए गए अभियानों ने सेना की क्षमता और रणनीति दोनों को मजबूती दी।
सीडीएस का पदभार संभालना उनके करियर का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ रहा। भारत के पहले चीफ़ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ के रूप में उन्होंने तीनों सेनाओं के एकीकरण, संसाधनों के साझा उपयोग, थिएटर कमांड्स की तैयारी, सैन्य आधुनिकीकरण और स्वदेशी रक्षा उत्पादन की दिशा में नए युग की शुरुआत की। उनकी सोच यह थी कि भविष्य के युद्ध पारंपरिक नहीं होंगे; साइबर, अंतरिक्ष और तकनीकी क्षमताएँ ही निर्णायक हथियार बनेंगी। इसीलिए उन्होंने तकनीकी आधारित सुरक्षा ढांचे को प्राथमिकता दी।
उनका नेतृत्व साहस और स्पष्टवादिता से परिपूर्ण था। वे निर्णय लेने में निर्भीक, राष्ट्र हित में अडिग और सैनिकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय थे। उनका सिद्धांत सरल थाl नेता वह है जो सबसे आगे खड़ा होकर नेतृत्व करे। यह व्यवहार उन्हें सेना के हर स्तर पर सम्मान दिलाता था।
हेलीकॉप्टर दुर्घटना में उनका निधन देश के लिए गहरा आघात था, परंतु उनके द्वारा शुरू किए गए सुधार आज भी भारतीय रक्षा प्रणाली को मजबूत बना रहे हैं। सैन्य एकीकरण और आत्मनिर्भर रक्षा व्यवस्था की दिशा में उठाए गए कदम उनकी दूरदर्शिता को स्थायी बनाते हैं।
जनरल बिपिन रावत केवल एक सैन्य अधिकारी नहीं थे, बल्कि भारतीय रक्षा चिंतन को आधुनिक और सक्षम बनाने वाले शिल्पकार थे। उनका जीवन यह संदेश देता है कि राष्ट्र सुरक्षा केवल ताक़त का विषय नहीं, बल्कि दृष्टि, साहस और निरंतर सुधार की प्रक्रिया है। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।
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