भारतीय ज्ञान परम्परा में आनंदमूर्ति के योगदान पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में “श्री श्री आनंदमूर्तिजी का भारतीय ज्ञान परम्परा में योगदान” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन महायोगी गुरु गोरक्षनाथ शोधपीठ के सभागार में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का आयोजन संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग द्वारा आनंद मार्ग प्रचारक संघ की बौद्धिक शाखा रेनैसाँस यूनिवर्सल (आरयू) के सहयोग से किया गया।
उद्घाटन सत्र में प्रो. प्रकाश मणि त्रिपाठी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत प्रो. कीर्ति पाण्डेय द्वारा अतिथियों के स्वागत से हुई। मुख्य वक्ता अनिल प्रताप गिरी ने भारतीय ज्ञान परम्परा पर विचार रखते हुए आनंदमूर्तिजी के विचारों की समकालीन उपयोगिता पर प्रकाश डाला। आचार्य दिव्यचेतनानन्द अवधूत ने ‘आनन्दसूत्रम्’ के दार्शनिक आधारों और ‘प्रोग्रेसिव यूटिलाइजेशन थ्योरी’ की विस्तार से व्याख्या की।
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि आध्यात्मिक साधना और ध्यान के माध्यम से ही वास्तविक आनंद की प्राप्ति संभव है। प्रो. कीर्ति पाण्डेय ने आनंद मार्ग के सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण को स्पष्ट किया। वक्ताओं ने कॉस्मिक चेतना, कॉस्मिक माइंड और सृष्टि के क्रमिक विकास जैसे विषयों पर गहन चर्चा की।
अपराह्न सत्र में विभिन्न विषयों के विद्वानों ने शोधपत्र प्रस्तुत किए। इसमें प्रो. आर. पी. सिंह, डॉ. रंजना बागची, प्रो. शरद मिश्रा, प्रो. दीपक प्रकाश त्यागी, डॉ. अनिल कुमार, डॉ. प्रवीण कुमार द्विवेदी एवं डॉ. पीयूष मिश्रा सहित अनेक विद्वानों ने अपने विचार रखे। सात्त्विक आहार के वैज्ञानिक आधार तथा उसके शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक प्रभावों पर विशेष चर्चा हुई।
कार्यक्रम के समन्वय में डॉ. कुशल नाथ मिश्र, संयोजन में डॉ. सूर्यकान्त त्रिपाठी तथा आयोजन सचिव के रूप में डॉ. धर्मेन्द्र कुमार सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अन्य शिक्षकों एवं आयोजन समिति के सदस्यों ने भी शैक्षणिक एवं व्यवस्थागत कार्यों में योगदान दिया।
संगोष्ठी के दौरान एक ऑनलाइन तकनीकी सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें शोधार्थियों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। कार्यक्रम में 200 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया, जिससे अकादमिक विमर्श को व्यापक आयाम मिला।

rkpNavneet Mishra

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