कैलाश सिंह
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)।आज का समाज सुविधाओं के मामले में अपने इतिहास के सबसे उन्नत दौर में खड़ा है। तकनीक, संचार, परिवहन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में हुई अभूतपूर्व प्रगति ने मानव जीवन को पहले से कहीं अधिक सहज और तेज़ बना दिया है। मोबाइल फोन, इंटरनेट, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन शिक्षा और टेलीमेडिसिन जैसी सुविधाओं ने आमजन के जीवन स्तर को ऊपर उठाया है। लेकिन इन तमाम उपलब्धियों के बीच एक चिंताजनक सच्चाई भी सामने आ रही है—सुविधाएं बढ़ने के साथ-साथ समाज में असुरक्षा की भावना गहराती जा रही है।
आज अपराध केवल गलियों और सड़कों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि मोबाइल और इंटरनेट के माध्यम से घरों के भीतर तक प्रवेश कर चुके हैं। साइबर ठगी, फर्जी कॉल, ओटीपी फ्रॉड, सोशल मीडिया पर बदनामी और ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग जैसे अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। सड़क अपराध, चेन स्नैचिंग, चोरी और महिलाओं के खिलाफ अपराध भी समाज के लिए गंभीर चुनौती बने हुए हैं। महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों की सुरक्षा आज भी पूरी तरह सुनिश्चित नहीं हो सकी है, जो विकास के दावों पर सवाल खड़े करती है।तकनीक ने जहां एक ओर जीवन को सरल बनाया है, वहीं दूसरी ओर अपराधियों को नए और खतरनाक हथियार भी सौंप दिए हैं। एक क्लिक में बैंक खाता खाली हो जाना, एक मैसेज से डर फैल जाना और एक वीडियो से सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंच जाना—यह आधुनिक युग के नए खतरे हैं। इनसे निपटने के लिए केवल कानून और पुलिस व्यवस्था पर्याप्त नहीं रह गई है। सबसे गंभीर चिंता का विषय सामाजिक संवेदनशीलता में लगातार आ रही कमी है। सुविधाओं की दौड़ में इंसान इतना व्यस्त हो गया है कि उसे अपने आस- पास के लोगों की पीड़ा दिखाई नहीं देती। पड़ोसी-पड़ोसी से कटते जा रहे हैं, संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और परिवारों के भीतर संवाद कम होता जा रहा है। भीड़ में रहने के बावजूद व्यक्ति खुद को अकेला, असुरक्षित और असहाय महसूस करता है। जब समाज में आपसी भरोसा कमजोर पड़ता है, तब सुरक्षा की नींव भी हिलने लगती है।
पुलिस, प्रशासन और कानून व्यवस्था अपनी-अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। सीसीटीवी कैमरे, गश्त, हेल्पलाइन नंबर और सख्त कानून बनाए जा रहे हैं, लेकिन इन सबके बावजूद यदि समाज स्वयं सजग और संवेदनशील नहीं होगा, तो सुरक्षित वातावरण का निर्माण अधूरा ही रहेगा।
अपराध को रोकने के लिए समाज की भागीदारी उतनी ही जरूरी है, जितनी प्रशासन की।
आज समय है आत्ममंथन का। यह सोचने की आवश्यकता है कि क्या हम केवल सुविधा-भोगी बनकर रह गए हैं? क्या नैतिक मूल्यों, सामाजिक जिम्मेदारियों और मानवीय संवेदनाओं को हमने पीछे छोड़ दिया है? सुरक्षित समाज का अर्थ केवल तकनीकी निगरानी और कठोर कानून नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक, संवेदनशील परिवार और जिम्मेदार समाज से है।
माता-पिता को बच्चों में केवल प्रतिस्पर्धा और सफलता की दौड़ नहीं, बल्कि ईमानदारी, करुणा और सामाजिक जिम्मेदारी के संस्कार भी देने होंगे। शिक्षा व्यवस्था को रोजगारोन्मुखी शिक्षा के साथ-साथ चरित्र निर्माण पर भी विशेष ध्यान देना होगा। वहीं समाज को मूक दर्शक बनने के बजाय अन्याय, अपराध और गलत प्रवृत्तियों के खिलाफ आवाज उठानी होगी।
सच्चाई यह है कि सुविधाओं के बीच बढ़ती असुरक्षा एक गंभीर चेतावनी है। यदि समय रहते सामाजिक मूल्यों को मजबूत नहीं किया गया, तो विकास के साथ भय भी बढ़ता चला जाएगा। एक सुरक्षित समाज वही है, जहां सुविधा के साथ विश्वास, कानून के साथ नैतिकता और अधिकारों के साथ कर्तव्यों का संतुलन बना रहे। यही संतुलन भविष्य की वास्तविक और स्थायी सुरक्षा की गारंटी है।
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