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उर्मिला का वनवास: त्याग, मौन और आंतरिक तपस्या का अदृश्य महाकाव्य

सुनीता कुमारी | बिहार

रामायण में वनवास का नाम आते ही राम, सीता और लक्ष्मण का चित्र हमारे मन में उभर आता है। चौदह वर्षों का कठोर वनजीवन, राक्षसों से संघर्ष और अंततः धर्म की स्थापना—यही रामायण का प्रचलित स्वरूप है।
परंतु इसी महाकाव्य में एक ऐसा वनवास भी है, जो जंगलों में नहीं, महलों के भीतर घटित होता है; जो दिखाई नहीं देता, पर भीतर ही भीतर मनुष्य को तपाकर निर्मल कर देता है। यह है—उर्मिला का वनवास।

उर्मिला: मौन में जिया गया वनवास

उर्मिला मिथिला की राजकुमारी थीं—सीता की छोटी बहन और लक्ष्मण की पत्नी। विवाह के कुछ ही समय बाद लक्ष्मण राम के साथ वनवास पर चले गए। यह निर्णय धर्म और कर्तव्य की दृष्टि से महान था, लेकिन उसी क्षण उर्मिला के जीवन में एक लंबा, निःशब्द अंधकार उतर आया।
उन्हें न साथ जाने का विकल्प मिला, न अपने त्याग की घोषणा करने का अवसर। वे अयोध्या के राजमहल में रहीं, लेकिन उनका मन, उनका अस्तित्व—सब वन में चला गया।

बाह्य नहीं, आंतरिक वनवास

सीता ने वन की कठोरता झेली, लक्ष्मण ने सेवा और सुरक्षा का दायित्व निभाया, पर उर्मिला ने वियोग और प्रतीक्षा का तप सहा।
उनका वनवास शरीर का नहीं, आत्मा का था।
चार दीवारों के भीतर रहते हुए भी उनका जीवन विरक्ति, संयम और मौन साधना बन गया।
जैसे दीपक घर में रखा हो, पर उसकी लौ बाहर फैले अंधकार से लड़ रही हो—उर्मिला वैसी ही दीपशिखा थीं।

निद्रा का त्याग और अदृश्य बलिदान

रामायण में लक्ष्मण के चौदह वर्षों तक निद्रा त्याग का उल्लेख प्रसिद्ध है। किंतु कई विद्वानों के अनुसार यह शक्ति उर्मिला के त्याग से संभव हुई—मानो लक्ष्मण की नींद उर्मिला ने अपने हिस्से में ले ली हो।
यह तथ्य चाहे प्रतीकात्मक हो, पर यह उर्मिला के बलिदान को अदृश्य और विराट बना देता है।
उन्होंने स्वयं को मिटाकर, अपने पति के धर्म को संभव बनाया।

वह त्याग, जिसे इतिहास ने नहीं सराहा

राम के वनवास पर अयोध्या रोई, सीता के दुख पर इतिहास ने आँसू बहाए, लक्ष्मण की सेवा की प्रशंसा हुई—पर उर्मिला के मौन का कोई उत्सव नहीं मनाया गया।
उनका त्याग न देखा गया, न पूछा गया।
यह समाज की उस प्रवृत्ति को उजागर करता है, जो दिखने वाले बलिदान को महिमामंडित करता है, पर मौन सहनशीलता को सहज मानकर अनदेखा कर देता है।

नारी का धैर्य या सामाजिक अपेक्षा?

यह प्रश्न स्वाभाविक है—क्या उर्मिला का मौन स्वैच्छिक धैर्य था या समाज की अपेक्षा?
संभवतः दोनों।
रामायणकालीन समाज में नारी से त्याग की अपेक्षा थी, पर उर्मिला केवल अपेक्षा पूरी नहीं करतीं—वे त्याग को अर्थ देती हैं।
वे दुख को शिकायत नहीं, साधना बना लेती हैं।
उनका मौन कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति है।

उर्मिला और लक्ष्मण: दो प्रकार का वनवास

• लक्ष्मण का वनवास सक्रिय है—जागरण, रक्षा, संघर्ष

• उर्मिला का वनवास निष्क्रिय दिखता है, पर भीतर से कहीं अधिक कठिन—प्रतीक्षा, स्मृति और विरह

यदि लक्ष्मण सीमा पर खड़ा सैनिक हैं, तो उर्मिला वह माँ हैं, जिसकी हर साँस अपनों की सलामती पर टिकी है।

आधुनिक संदर्भ में उर्मिला

आज उर्मिला उन असंख्य स्त्रियों और व्यक्तियों का प्रतीक हैं—

• जो परिवार के लिए अपने सपनों को स्थगित करते हैं

• जो दूसरों की सफलता के पीछे अदृश्य श्रम देते हैं

• जो साथ होते हुए भी अकेलापन जीते हैं

उर्मिला केवल पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि संवेदनशील मानव चेतना का प्रतीक हैं।

उर्मिला का वनवास रामायण का उपेक्षित अध्याय नहीं, बल्कि उसकी आत्मा है।
यह हमें सिखाता है कि—

• धर्म केवल रणभूमि में नहीं, प्रतीक्षा कक्षों में भी निभाया जाता है

• त्याग केवल वनों में नहीं, महलों के सन्नाटे में भी होता है

यदि रामायण को केवल वीरता का ग्रंथ माना जाए, तो वह अधूरी है।
उसे पूर्ण बनाता है उर्मिला का मौन, उनका धैर्य और उनका अदृश्य वनवास। क्योंकि इतिहास उन्हें याद रखता है जो बोलते हैं,
लेकिन संस्कृति उन्हीं से बनती है—जो चुपचाप सहते हैं।

Karan Pandey

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