गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। भारत त्योहारों का देश है।यहां हर त्योहार से जुड़ी कुछ परंपराएं भी होती हैं।ये परंपराएं अपने आप में बहुत विशेष होती है।कुछ परंपराओं के पीछे धार्मिक कारण होते हैं जो कुछ के पीछे वैज्ञानिक कारण छिपे होते हैं।इन परंपराओं को सिरे से नकारा नहीं जा सकता। आज हम आपको मकर संक्रांति से जुड़ी दो खास परंपराओं के बारे में बता रहे हैं। जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है तो मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है।इस पर्व पर मुख्य रूप से तिल-गुड़ से बने पकवानों का सेवन करने की परंपरा है। साथ ही इस दिन पतंग उड़ाने की परंपरा भी है। मकर संक्रांति से जुड़ी ये दोनों परंपरा अपने आप में अनूठी है।
मकर संक्रांति के दिन तिल-गुड़ के पकवान खाना और पतंग उड़ाना इस त्योहार की पहचान है। इन परंपराओं के पीछे कुछ वैज्ञानिक तथ्य भी छिपे हैं, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। आज हम आपको मकर संक्रांति से जुड़ी इन परंपराओं के पीछे छिपे वैज्ञानिक कारणों के बारे में बता रहे हैं।पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूर्णन के कारण हम दिन ब रात का अनुभव करते हैं,लेकिन ये दिन ब रात सम्पूर्ण पृथ्वी पर सब जगह एक जैसा नहीं होता है , जितनी सूर्य की किरणें पृथ्वी के जिस भाग पर पड़ रही होती हैं उसी हिसाब से दिन तय होता है,जैसे प्रथ्वी को दो गोलार्धों में बांटा गया है एक उत्तरी गोलार्ध ब दूसरा दक्षिणी गोलार्ध जिनमें जिस पर पड़ने बाली सूर्य की किरणें प्रथ्वी पर दिन तय करती हैं,और इसका अपने अक्ष पर 23.5 अंश झुके होने के कारण दोनो गोलार्धों में मौसम भी अलग अलग होता है, अगर हम बात करें उत्तरायण ब दक्षिणायन की तो हम पाते हैं कि यह एक खगोलीय घटना है, 14/15 जनवरी के बाद सूर्य उत्तर दिशा की ओर अग्रसर या जाता हुआ होता है,जिसमें सूर्य दक्षिणी गोलार्ध से उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश दक्षिण से उत्तर की ओर गमन प्रतीत करता है, इसे उत्तरायण या सूर्य उत्तर की ओर के नाम से भी जाना जाता है।
खगोल विज्ञान एजुकेटर अमर पाल सिंह द्वारा बताया गया कि वैज्ञानिकता के आधार पर इस घटना के पीछे का मुख्य कारण है पृथ्वी का छः महीनों के समय अवधि के उपरांत उत्तर से दक्षिण की ओर बलन करना,जो कि एक प्राकृतिक प्रक्रिया है,जो लोग उत्तरी गोलार्ध में रहते हैं उनके लिए सूर्य की इस राशि परिबर्तन के कारण 14/15 जनवरी का दिन मकर संक्रांति के तौर पर मनाते हैं,और उत्तरी गोलार्ध में निवास करने वाले व्यक्तियों द्वारा ही समय के साथ धीरे धीरे मकर मण्डल के आधार पर ही मकर संक्रांति की संज्ञा अस्तित्व में आई है।मकर संक्रांति का अर्थ है सूर्य का क्रांतिवृत्त के दक्षिणायनांत या उत्तरायनारंभ बिंदु पर पहुंचना, प्राचीन काल से सूर्य मकर मण्डल में प्रवेश करके जब क्रांतिवृत्त के सबसे दक्षिणी छोर से इस दक्षिणायनांत या उत्तरायनारंभ बिंदु पर पहुंचता था,तब वह दिन 21 या 22 दिसंबर सबसे छोटा होता था, मगर अब सूर्य जनवरी के मध्य में मकर मण्डल में प्रवेश करता है, वजह यह है कि अयन चलन के कारण दक्षिणायनांत या उत्तरायनारंभ बिंदु अब पश्चिम की ओर के धनु मण्डल में सरक गया है,अब बास्तबिक मकर संक्रांति दक्षिणायनांत या उत्तरायनारंभ बिंदु का आकाश के मकर मण्डल से कोई लेना देना नहीं रह गया है।
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