भारत में तंबाकू पूर्ण निषेध की तात्कालिक आवश्यकता: जनस्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और नैतिकता पर निर्णायक विधायी पहल
राष्ट्रीय तंबाकू निषेध अधिनियम 2026 एवं भारतीय तंबाकू उत्पाद निषेध विधेयक 2026 को बजट सत्र में तात्कालिक शेड्यूल करना क्यों ज़रूरी
तंबाकू आज केवल एक व्यक्तिगत आदत नहीं, बल्कि भारत सहित पूरे विश्व के लिए एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा बन चुका है। प्रतिवर्ष लाखों मौतें, असंख्य परिवारों की आर्थिक-सामाजिक तबाही और भावी पीढ़ियों के स्वास्थ्य पर मंडराता खतरा — यह सब तंबाकू महामारी के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में इसकी भयावहता और भी गहरी है।
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ऐसे समय में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक है कि क्या केवल कर वृद्धि, चेतावनी चित्र और जागरूकता अभियान पर्याप्त हैं? या अब समय आ गया है कि भारत में तंबाकू पर पूर्ण, व्यापक और कठोर कानूनी निषेध लागू किया जाए।
प्रस्तावित राष्ट्रीय तंबाकू निषेध (निर्माण, बिक्री एवं उपभोग निषेध) एवं जनस्वास्थ्य संरक्षण अधिनियम, 2026 तथा भारतीय तंबाकू उत्पाद (निर्माण, भंडारण, परिवहन, बिक्री और आयात) निषेध विधेयक, 2026 को संसद के बजट सत्र में तात्कालिक रूप से प्रस्तुत करना आज की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य आवश्यकता बन चुकी है।
तंबाकू महामारी: भारत के जनस्वास्थ्य पर बहुआयामी आघात
स्वास्थ्य की दृष्टि से तंबाकू का प्रभाव घातक और सर्वव्यापी है। धूम्रपान और धुआँ-रहित तंबाकू दोनों ही शरीर के लगभग हर अंग को प्रभावित करते हैं। फेफड़ों का कैंसर, मुख एवं गले का कैंसर, हृदयाघात, स्ट्रोक, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिज़ीज़ जैसी बीमारियाँ सीधे तौर पर तंबाकू सेवन से जुड़ी हैं।
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भारत में गुटखा, पान मसाला और अन्य धुआँ-रहित तंबाकू उत्पादों के कारण मुख कैंसर के मामलों में खतरनाक वृद्धि देखी जा रही है। यह संकट केवल उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं है। पैसिव स्मोकिंग के कारण बच्चे, महिलाएँ और बुजुर्ग भी गंभीर जोखिम में हैं। गर्भवती महिलाओं पर इसका प्रभाव भ्रूण के विकास को प्रभावित करता है, जिससे कम वजन या जन्मजात विकृतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
तंबाकू प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करता है, जिससे टीबी जैसी संक्रामक बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। इस प्रकार तंबाकू एक ऐसी महामारी है जो गैर-संचारी और संक्रामक दोनों प्रकार की बीमारियों को बढ़ावा देती है।
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भारत में तंबाकू नियंत्रण कानून: क्यों साबित हो रहे हैं अपर्याप्त
भारत में पहले से ही सिगरेट्स एंड अदर टोबैको प्रोडक्ट्स एक्ट (COTPA) 2003, सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध, विज्ञापन प्रतिबंध और पैकेजिंग पर चेतावनी जैसे प्रावधान मौजूद हैं। कई राज्यों में गुटखा प्रतिबंध भी लागू है और भारत अंतरराष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण संधियों का पक्षकार है।
इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि तंबाकू उत्पाद आज भी आसानी से उपलब्ध, सस्ते और सामाजिक रूप से स्वीकार्य बने हुए हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में छोटे दुकानों, पान ठेलों पर गुटखा और बीड़ी खुलेआम बिक रहे हैं, जिससे किशोर और युवा वर्ग भी इसकी चपेट में आ रहा है। यह स्पष्ट करता है कि मौजूदा कानूनों में कठोर प्रवर्तन और पूर्ण निषेध की कमी है।
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सामाजिक और नैतिक संकट: तंबाकू से बढ़ती असमानता
सामाजिक दृष्टि से तंबाकू परिवारों में तनाव, आर्थिक दबाव और मानसिक पीड़ा का कारण बनता है। जब परिवार का कमाने वाला सदस्य तंबाकू जनित बीमारी से ग्रसित होता है, तो पूरा परिवार गरीबी और कर्ज के चक्र में फँस जाता है।
बीड़ी उद्योग जैसे क्षेत्रों में कार्यरत श्रमिक, विशेषकर महिलाएँ और बाल श्रमिक, अत्यंत अमानवीय परिस्थितियों में काम करते हैं। वे स्वयं भी तंबाकू धूल और रसायनों के संपर्क में आकर गंभीर स्वास्थ्य जोखिम उठाते हैं। यह सामाजिक असमानता को और गहरा करता है।
नैतिक दृष्टि से यह प्रश्न गंभीर है कि जब तंबाकू से मृत्यु और गंभीर रोग होना निर्विवाद सत्य है, तब भी इसका उत्पादन और विपणन कैसे जारी रह सकता है। लाभ के लिए मानव जीवन की कीमत चुकाना किसी भी नैतिक समाज के मूल्यों के विपरीत है।
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आर्थिक तर्क का भ्रम: राजस्व से अधिक है राष्ट्रीय नुकसान
अक्सर तंबाकू के पक्ष में राजस्व का तर्क दिया जाता है। परंतु वास्तविकता यह है कि तंबाकू से होने वाला आर्थिक नुकसान, उससे मिलने वाले कर राजस्व से कहीं अधिक है।
इलाज पर होने वाला भारी खर्च, काम से अनुपस्थिति, उत्पादकता में गिरावट और समयपूर्व मृत्यु — यह सब मिलकर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर गंभीर बोझ डालते हैं। गरीब परिवार अपनी सीमित आय का बड़ा हिस्सा तंबाकू पर खर्च करते हैं, जिससे बच्चों की शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य प्रभावित होता है। यह अंतरपीढ़ी गरीबी को जन्म देता है।
पूर्ण निषेध ही समाधान: 2026 के विधेयकों की ऐतिहासिक भूमिका
अब समय आ गया है कि भारत कर वृद्धि और चेतावनी तक सीमित नीति से आगे बढ़े। राष्ट्रीय तंबाकू निषेध अधिनियम 2026 और भारतीय तंबाकू उत्पाद निषेध विधेयक 2026 यदि लागू होते हैं, तो यह जनस्वास्थ्य की दिशा में ऐतिहासिक कदम होगा।
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अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताते हैं कि सख्त प्रतिबंध, सादे पैकेजिंग और कठोर जुर्माने से तंबाकू सेवन में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। साथ ही, तंबाकू उद्योग से जुड़े श्रमिकों के पुनर्वास, वैकल्पिक रोजगार और किसानों के लिए वैकल्पिक फसलों की व्यवस्था कर आर्थिक प्रभाव को संतुलित किया जा सकता है।
निष्कर्ष
तंबाकू केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित, सामाजिक न्याय और भावी पीढ़ियों की सुरक्षा का प्रश्न है। यदि भारत को स्वस्थ, उत्पादक और नैतिक रूप से सुदृढ़ राष्ट्र बनाना है, तो संसद के बजट सत्र में तंबाकू पर पूर्ण और कठोर निषेध कानून प्रस्तुत कर निर्णायक कदम उठाना अनिवार्य है।
यह कदम भारत को वैश्विक स्तर पर यह संदेश देगा कि मानव जीवन और जनस्वास्थ्य किसी भी राजस्व या औद्योगिक हित से ऊपर हैं।
लेखक / संकलनकर्ता
कर विशेषज्ञ स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि, संगीत माध्यमा, सीए (एटीसी), एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं
गोंदिया, महाराष्ट्र
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