हिन्दी का विश्वव्यापी स्वरूप निर्मित हो चुका है:- प्रो. हरीश शर्मा

हिन्दी की समृद्धि उसके मूल संस्कृत भाषा में है: प्रो. विजय कृष्ण ओझा

संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। हिन्दी का विश्वव्यापी स्वरूप निर्मित हो चुका है। इसमें तनिक भी संदेह नही कि हिन्दी न सिर्फ भारत में बोली जाती है। बल्कि विश्व के अनेक देशों में भी बोली जाती है। इस आशय का विचार प्रभादेवी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिन्दी दिवस पर आयोजित कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. हरीश कुमार शर्मा ने व्यक्त किए। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय , कपिलवस्तु के वरिष्ठ आचार्य प्रो. हरीश कुमार शर्मा ने कहा कि वैश्विक क्षितिज पर हिन्दी के फैलते स्वरूप को देखकर हम निर्भ्रांत कह सकते हैं कि हिन्दी ने विश्व संदर्भ में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका बना ली है।
प्रो. शर्मा ने कहा कि हमें हिन्दी की साथ अन्य भाषाओं को भी जानना चाहिए। क्योंकि सिर्फ एक भाषा से आज के प्रतिस्पर्धी दौर में काम नहीं चल सकता। हमे हिन्दी के साथ आज रोजगार परक अंग्रेजी भाषा को भी पढ़ना और जानना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि हिन्दी दिवस पर हमें यह प्रण लेना है कि हम कम से कम दो बच्चों को हिन्दी सीखने के लिए प्रेरित करेंगे और सिखाएंगे। प्रो.शर्मा ने स्वरचित गीत “हिन्दी दिवस है आया, चलो न सब मिलकर मनाए” प्रस्तुत किया। विषय प्रवर्तन करते हुए अध्यक्ष हिन्दी विभागाध्यक्ष डा. अमर नाथ पाण्डेय ने कहा कि हिन्दी देश ही नही विश्व की एकमात्र लोकतांत्रिक भाषा है। हिन्दी का फलक असीमित है। इसमें आदिकाल से मध्यकाल तक की भाषाओं बोलियों का समावेश है। डॉ. पाण्डेय ने कहा कि हिन्दी दिवस की सार्थकता हिन्दी के अधिकाधिक प्रयोग में हैं। आज हिन्दी की अपनी समृद्ध परिभाषिक शब्दावली हैं जिसका प्रयोग किया जाना चाहिए। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. विजय कृष्ण ओझा,आचार्य, संस्कृत विभाग हीरालाल रामनिवास स्नातकोत्तर महाविद्यालय ने कहा कि हिन्दी की समृद्धि उसके मूल उदगम संस्कृत भाषा में है। संस्कृत से ही हिन्दी सुसंस्कृत हुई है। डॉ. ओझा ने कहा कि हिन्दी निस्संदेह एक सम्पन्न भाषा है और इसकी समृद्धि इसके शिक्षकों और छात्र-छात्राओं द्वारा पुष्ट होती हैं। हिन्दी का अपना एक विशाल शब्द भंडार हैं और निरन्तर इन शब्दों का प्रयोग कर हम इसे और भी ज्यादा समृद्ध बना सकते हैं। महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. प्रमोद कुमार त्रिपाठी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए अपने स्वागत वक्तव्य में कहा कि हिन्दी हिन्दुस्तान की पहचान ही नहीं जरूरत भी है। आभार ज्ञापन . कौशलेंद्र मणि त्रिपाठी व संचालन हिंदी विभाग की आचार्य सीमा पाण्डेय ने किया। इसके पूर्व महाविद्यालय के समन्वयक विजय कुमार राय ने अतिथियों को स्मृति चिन्ह एवं अंगवस्त्र प्रदान कर स्वागत किया व कार्यक्रम का सुभारंभ मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण व दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। इस अवसर पर महाविद्यालय के छात्र पारस यादव और छात्रा रागिनी चौरसिया ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम को सफल बनाने में चैनल मैनेजर रितेश त्रिपाठी, महाविद्यालय के विभिन्न विभागों के आचार्यगण श्रीकृष्ण पाण्डेय, संदीप पाण्डेय, डा. अजय कुमार, पूनम उपाध्याय, सुनीता गौतम, शालिनी मिश्रा, माया, ममता शुक्ला, कल्याणी त्रिपाठी, नेहा कन्नौजिया, शाहिदा खातून, संतोष गौंड, अमन राय, विशाल सिंह, उमेश सिंह, अजय कुमार आदि उपस्थित रहे।

Karan Pandey

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