व्यंग्यकार – राजेंद्र शर्मा
नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने आने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए अपना राजनीतिक अभियान तेज कर दिया है। भले ही चुनाव आयोग ने अभी चुनाव की तारीखों की आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन सत्ताधारी दल का चुनावी मोड पूरी तरह सक्रिय हो चुका है। आमतौर पर माना जा रहा है कि अप्रैल में संभावित चुनावों के लिए फरवरी के दूसरे पखवाड़े में तारीखों का ऐलान किया जाएगा। इस अंतराल में सत्ताधारी पार्टी को सरकारी संसाधनों और योजनाओं के सहारे अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की लगभग खुली छूट मिल जाती है।
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वास्तविकता यह है कि चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद भी सत्ताधारी दल और उसके शीर्ष नेताओं पर कोई प्रभावी रोक-टोक देखने को नहीं मिलती। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर लगातार उठ रहे सवालों के बीच यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि आयोग अब एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के बजाय सत्ता पक्ष के हितों के अनुरूप काम करता दिखाई देता है। ऐसे में चुनाव से पहले और बाद के दौर में फर्क लगभग समाप्त हो गया है।
यह स्थिति हमेशा से ऐसी नहीं थी। भारतीय चुनाव प्रणाली का विकास लंबे समय तक अधिक स्वतंत्र, निष्पक्ष और समावेशी दिशा में हुआ था। टी. एन. शेषन के कार्यकाल में चुनाव आयोग ने आदर्श आचार संहिता को सख्ती से लागू कर कार्यपालिका से अपनी स्वायत्तता स्थापित की थी। यही वह दौर था जब चुनाव प्रक्रिया को लोकतंत्र की आत्मा माना जाता था।
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लेकिन बीते वर्षों में यह दिशा उलट गई है। आज चुनाव प्रक्रिया पर कार्यपालिका का सीधा प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। मतदाता सूचियों का विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) जैसे कदम, लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मतदाताओं की राय जानने के बजाय, सत्ता के अनुकूल मतदाताओं को चुनने का माध्यम बनाते प्रतीत हो रहे हैं।
उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से आ रही खबरें इस आशंका को और गहरा करती हैं। अल्पसंख्यकों, दलितों, महिलाओं और कमजोर वर्गों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने, वहीं संदिग्ध तरीके से नए नाम जोड़े जाने के आरोप सामने आए हैं। यह सब एक संगठित और लक्षित प्रयास की ओर इशारा करता है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर खतरा है।
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चुनावी दौर में एक और चिंताजनक प्रवृत्ति सामने आती है—सांप्रदायिक मुद्दों का खुला उपयोग और सरकारी योजनाओं को निजी चुनावी लाभ में बदलना। घुसपैठ जैसे शब्दों का चयनात्मक प्रयोग, समाज में विभाजन को और गहरा करता है। वहीं सरकारी घोषणाओं को चुनावी उपकार के रूप में प्रस्तुत कर नागरिकों को अधिकार-संपन्न मतदाता के बजाय कृपा-आश्रित प्रजा में बदलने की कोशिश की जा रही है।
यह स्थिति लोकतंत्र को एक खोखले ढांचे में बदलने का संकेत देती है, जहां चुनाव केवल सत्ता को वैधता देने का औजार बनकर रह जाएं। यदि लोकतंत्र को तानाशाही के खोल में सिमटने से बचाना है, तो चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाना और हर उल्लंघन का हिसाब मांगना अनिवार्य होगा। नागरिकों को अपनी पहचान और अधिकारों की रक्षा के लिए सजग होना ही होगा, तभी चुनाव वास्तव में जनतंत्र का उत्सव बन सकेंगे।
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