महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। जीवन और सृष्टि का संबंध उतना ही गहरा है जितना एक बूंद का सागर से। मनुष्य अपनी उपलब्धियों के कारण स्वयं को अक्सर केंद्र में रखता है, लेकिन सच यह है कि वह इस विराट ब्रह्मांड का केवल एक अंश है। जैसे ही प्रकृति और मानव के बीच संतुलन बिगड़ता है, अस्तित्व पर संकट के संकेत स्पष्ट दिखने लगते हैं।
धरती, जल, वायु, अग्नि और आकाश – ये पंचतत्व केवल शरीर का आधार नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि की रचना के मूल तत्व हैं। इन्हीं तत्वों में संतुलन बना रहे, तभी जीवन सुरक्षित रह सकता है।
भारतीय दर्शन की दृष्टि: सह-अस्तित्व का संदेश
भारतीय परंपरा ने सृष्टि को केवल भौतिक रूप में नहीं देखा। वेद और उपनिषद में जीवन को एक सतत प्रवाह बताया गया है। जन्म और मृत्यु को अंतिम सत्य नहीं, बल्कि यात्रा का एक पड़ाव माना गया है।
भगवद गीता में प्रकृति और पुरुष के संतुलन को जीवन की आधारशिला बताया गया है। श्रीकृष्ण का संदेश स्पष्ट है – मनुष्य को प्रकृति के साथ सहयोग और सामंजस्य बनाकर चलना चाहिए।
यह दर्शन हमें विनम्र बनाता है। यह बताता है कि मनुष्य सृष्टि का स्वामी नहीं, बल्कि उसका संरक्षक है।
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विज्ञान क्या कहता है?
आधुनिक विज्ञान भी आज उसी सत्य की पुष्टि करता है। खगोल विज्ञान के अनुसार अरबों वर्ष पहले हुए महाविस्फोट को Big Bang Theory कहा जाता है। इसी घटना से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई।
महान वैज्ञानिक Albert Einstein ने ऊर्जा और पदार्थ के संबंध को अपने प्रसिद्ध सिद्धांत E=mc² से स्पष्ट किया। उनके अनुसार सृष्टि का हर कण ऊर्जा का रूपांतरण है।
यह तथ्य आध्यात्म और विज्ञान के बीच एक सेतु का काम करता है। दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि ब्रह्मांड एक ऊर्जा-आधारित व्यवस्था है।
पर्यावरणीय संतुलन: अस्तित्व की शर्त
धरती पर जीवन के विकास ने जैव विविधता को जन्म दिया। सूक्ष्म जीवों से लेकर विशाल वृक्षों और मनुष्य तक, हर जीव एक-दूसरे से जुड़ा है।
लेकिन जब मानव अंधाधुंध संसाधनों का दोहन करता है, तब यह संतुलन टूटता है। जलवायु परिवर्तन, असामान्य मौसम, बाढ़, सूखा और जैव विविधता का संकट उसी असंतुलन के संकेत हैं।
आज “विकास” की परिभाषा पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। क्या वह विकास सही है, जो प्रकृति को नुकसान पहुंचाकर हासिल किया जाए?
विकास बनाम जिम्मेदारी
तकनीकी प्रगति और आधुनिकता जरूरी हैं। लेकिन यदि इसकी कीमत पर्यावरणीय विनाश है, तो यह प्रगति स्थायी नहीं रह सकती।
शिक्षा, विज्ञान और आध्यात्म का संतुलित समन्वय ही भविष्य का रास्ता दिखा सकता है।
मानव को यह स्वीकार करना होगा कि वह सृष्टि का नियंत्रक नहीं, बल्कि संरक्षक है। यही सोच आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित धरती सुनिश्चित कर सकती है।
भावनात्मक सत्य: संबंध को समझना जरूरी
जीवन और सृष्टि का रिश्ता प्रयोगशाला के वैज्ञानिक तथ्यों से लेकर साधना के आध्यात्मिक अनुभव तक फैला हुआ है।
यदि मनुष्य इस गहरे संबंध को समझ ले और अपने विकास की दिशा को संतुलित कर ले, तो न केवल उसका भविष्य सुरक्षित होगा, बल्कि पूरी मानवता का अस्तित्व भी संरक्षित रहेगा।
आज आवश्यकता है जागरूकता की, जिम्मेदारी की और प्रकृति के प्रति सम्मान की।
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