बंदरों और आवारा पशुओं का आतंक बना किसानों के लिए अभिशाप, खेत में खून-पसीने की कमाई हो रही तबाह

(राजकुमार मणि व सुधीर राय की रिपोर्ट)

गोरखपुर/देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)किसानों की आंखों से छलकता आंसू, उनकी मेहनत की बर्बादी और भविष्य की चिंता बयां करता है। सैकड़ों से लेकर लाखों रुपये की लागत से तैयार किए गए बाग-बगैचे, सब्जियां और खेतों की फसलें जब तैयार होने को होती हैं, तब बंदरों और आवारा पशुओं का हमला किसानों की उम्मीदों को चट कर जाता है।
किसान रात-दिन मेहनत करके खेतों में बागवानी, फलदार वृक्ष और सब्जियों की खेती करते हैं ताकि उत्पादन बढ़े और लाभ के माध्यम से जीवन चल सके। लेकिन जैसे ही फसलें पकने लगती हैं, बंदरों का झुंड और आवारा पशु खेतों में घुसकर उसे नष्ट कर देते हैं। कई बार किसान इन्हें भगाने की कोशिश करते हैं, तो खुद घायल हो जाते हैं।

बढ़ता आतंक, घटता आत्मविश्वास
एक किसान ने बताया, “कई बार हमारी मेहनत की पूरी फसल बंदर और पशु नष्ट कर जाते हैं। रात में चौकीदारी करनी पड़ती है, लेकिन फिर भी कुछ नहीं बचता।” परिणामस्वरूप किसान न केवल आर्थिक रूप से कमजोर हो रहा है बल्कि मानसिक रूप से भी टूट रहा है।कर्ज में डूबते किसान, बढ़ती आत्महत्याएं
खेती से लाभ के बजाय नुकसान झेल रहे किसान कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं। कुछ किसान तो आत्महत्या जैसा कदम भी उठा चुके हैं, जिनका जिम्मेदार कौन होगा?

प्रशासनिक चुप्पी, सरकार की अनदेखी
हालांकि कई बार स्थानीय प्रशासन से लेकर संबंधित अधिकारियों को शिकायत दी गई है, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। न बंदरों के लिए कोई पकड़ने का इंतजाम है और न ही आवारा पशुओं को रोकने का कोई स्थायी समाधान।

किसानों की मांगें: बंदरों की धरपकड़ के लिए वन विभाग की विशेष टीम तैनात की जाए ।हर गांव में ‘पशु आश्रय केंद्र’ का संचालन प्रभावी तरीके से हो।फसल बर्बादी पर मुआवजा देने की ठोस नीति बने।बंदरों और आवारा पशुओं से सुरक्षा हेतु सरकारी सब्सिडी पर सौर फेंसिंग या अन्य तकनीक उपलब्ध कराई जाए

यदि नहीं हुआ समाधान, तो क्या होगा?
अगर जल्द ही सरकार ने इस विषय में गंभीरता नहीं दिखाई, तो किसान खेती-किसानी से मुंह मोड़ने को मजबूर होंगे। इसका असर न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, बल्कि खाद्यान्न संकट जैसी राष्ट्रीय समस्याएं भी सामने आ सकती हैं।
खेती को लाभकारी बनाने के दावे तभी सार्थक होंगे जब किसान के पसीने की फसल उसकी थाली तक पहुंचे, न कि पशुओं के पेट में। किसानों की यह व्यथा अब केवल स्थानीय मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुकी है।

Editor CP pandey

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