कैलाश सिंह
महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। परिवर्तन की बातें हर मंच पर गूंजती हैं—चाहे सरकार की योजनाएं हों, जनप्रतिनिधियों के दावे हों या फिर विभागों की मीटिंगों में लिए जाने वाले तथाकथित फैसले। लेकिन सवाल यहीं खड़ा है कि जमीन पर बदलाव क्यों दिखाई नहीं देता? आखिर कौन है जो इस प्रक्रिया को आधे-अधूरे प्रयासों तक सीमित कर देता है?
स्थानीय स्तर से लेकर जिला प्रशासन तक हालात वही हैं—सड़कें टूटी, सफाई व्यवस्था ढीली, अस्पतालों में संसाधनों की कमी और कानून-व्यवस्था में सुधार के बजाय बढ़ती चुनौती। हर समस्या पर विभाग अपना पक्ष रखता है, लेकिन काम की गति सवालों के घेरे में है। योजनाएं बनती हैं, बजट पास होता है, फोटो सेशन होता है, पर जमीनी हकीकत बदलने का नाम नहीं लेती।
जनता सवाल पूछती है—जब योजनाएं हर साल आती हैं, तो समस्याएं क्यों जस की तस रहती हैं?
जिम्मेदार विभाग खुद भी मानते हैं कि कई कामों में तकनीकी कारण , अप्राप्त अनुमोदन और बजट की कमी जैसी बातें रोड़ा बनती हैं, लेकिन इन बहानों के बीच आम आदमी रोजाना मुश्किलें झेलता रहता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सुधार के लिए सिर्फ घोषणा नहीं, बल्कि लगातार निगरानी और सख्त जवाबदेही की आवश्यकता है। जब तक अधिकारी फील्ड में जाकर वास्तविक समस्याओं को नहीं समझेंगे, और काम पूरा होने तक जिम्मेदार ठहराए नहीं जाएंगे, तब तक परिवर्तन की राह लंबी ही रहेगी। जनता उम्मीद लगाए बैठी है कि विभागों के ये आधे- अधूरे प्रयास किसी दिन पूर्ण होंगे। लेकिन उस दिन का इंतज़ार लंबा न हो, इसके लिए ज़रूरी है कि जिम्मेदार जागें और वादों को वास्तविकता में बदलें। क्योंकि परिवर्तन केवल कागजों में नहीं, जमीन पर दिखना चाहिए—और यही समय की मांग है।
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