तनाव भरे दौर में अध्यात्म का अमृत: भीतर की शांति ही सच्ची सफलता

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। तेजी से बदलते आधुनिक दौर में सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन मानसिक शांति घटती जा रही है। प्रतिस्पर्धा, करियर का दबाव, आर्थिक असुरक्षा, पारिवारिक अपेक्षाएं और सोशल मीडिया की तुलना ने व्यक्ति को भीतर से थका दिया है। बाहरी उपलब्धियों के बावजूद चिंता, अवसाद और अकेलापन आज आम समस्या बन चुके हैं। ऐसे समय में अध्यात्म केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि संतुलित और तनावमुक्त जीवन का व्यावहारिक मार्ग बनकर उभर रहा है।

अध्यात्म: पलायन नहीं, संतुलन का मार्ग

अध्यात्म का अर्थ संसार छोड़ देना नहीं, बल्कि परिस्थितियों के बीच मानसिक संतुलन स्थापित करना है। यह हमें वर्तमान में जीने और स्वयं को समझने की प्रेरणा देता है। अक्सर तनाव का कारण परिस्थितियां नहीं, बल्कि उनके प्रति हमारी प्रतिक्रिया होती है। ध्यान, प्रार्थना और मौन चिंतन इस प्रतिक्रिया को सकारात्मक दिशा देने में सहायक होते हैं।

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गीता का संदेश आज भी प्रासंगिक

भारतीय ज्ञान परंपरा में मानसिक संतुलन को सफल जीवन की आधारशिला माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सिखाया—कर्म करो, फल की चिंता मत करो। यह सिद्धांत आज के कॉर्पोरेट जीवन, शिक्षा व्यवस्था और पारिवारिक संघर्षों में भी उतना ही लागू होता है। जब व्यक्ति परिणाम से अधिक कर्म पर ध्यान देता है, तो मानसिक दबाव स्वतः कम होने लगता है।

आधुनिक विज्ञान भी मानता है तनाव का खतरा

चिकित्सा विज्ञान के अनुसार उच्च रक्तचाप, अनिद्रा, अवसाद और हृदय रोग जैसी समस्याएं मानसिक तनाव से जुड़ी हैं। योग, ध्यान और सकारात्मक चिंतन न केवल मन को शांत करते हैं, बल्कि शरीर की प्रतिरोधक क्षमता और ऊर्जा स्तर को भी बढ़ाते हैं।

समाज में अध्यात्म की बढ़ती जरूरत

अध्यात्म को केवल पूजा-पाठ तक सीमित रखने के बजाय जीवनशैली का हिस्सा बनाना होगा। विद्यालयों में योग और नैतिक शिक्षा, परिवारों में संवाद और संस्कार, तथा समाज में सकारात्मक सोच को बढ़ावा देना समय की मांग है। भीतर से संतुलित व्यक्ति ही परिवार और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियां बेहतर ढंग से निभा सकता है।

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Karan Pandey

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