✍️ कैलाश सिंह
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। समाज में इंसानी रिश्तों की गर्माहट लगातार कमजोर होती जा रही है। आज मानवीय भावनाओं की जगह पैसे, पद और प्रतिष्ठा ने ले ली है, जिसके कारण रिश्ते अब दिल की सच्चाई से नहीं, बल्कि स्वार्थ की तराजू पर तौले जाने लगे हैं।
एक समय था जब परिवार प्रेम, सहारा और सम्मान का प्रतीक माना जाता था, लेकिन आधुनिकता, दिखावे और आर्थिक प्रतिस्पर्धा ने इन रिश्तों की जड़ों को हिला दिया है।
समाज में ऐसे हालात बनते जा रहे हैं जहाँ बुजुर्ग माता-पिता तक अकेलेपन का बोझ झेल रहे हैं। जिन बच्चों के भविष्य के लिए मां-बाप ने जीवनभर संघर्ष किया, वही बच्चे उनके अंतिम समय में जिम्मेदारी से दूर भागने लगे हैं। रिश्तों का यह दोहरा रूप लोगों को भीतर तक तोड़ देता है।
पैसे और पद की चमक जब तक होती है, तब तक लोग आसपास रहते हैं—सलाह, साथ और अपनापन दिखाते हैं। लेकिन जैसे ही बीमारी, उम्र या आर्थिक कठिनाई दस्तक देती है, लोग दूरी बना लेते हैं।
यह स्थिति केवल किसी एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की गिरती संवेदनाओं का आईना है।
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आज कई घरों में अपनापन खत्म होता जा रहा है। दिखावा, बनावट और स्वार्थपूर्ण व्यवहार ने रिश्तों की नींव को कमजोर कर दिया है।
लोग भूल रहे हैं कि धन व पद स्थायी नहीं, लेकिन दुआएँ, अच्छे कर्म और इंसानियत हमेशा याद रहती है।
समाज को समझना होगा कि यदि मानवीयता खत्म हो गई, तो रिश्तों की भूमि पूरी तरह बंजर हो जाएगी।
समय की मांग है कि स्वार्थ का खेल रुके, घरों में अपनापन लौटे और रिश्तों की गर्माहट फिर से जगाई जाए, क्योंकि यही किसी सभ्य समाज की असली पहचान है।
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