डॉ. सतीश पाण्डेय
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। आज का लोकतंत्र शब्दों की ऐसी चमक में उलझता जा रहा है, जहां सच्चाई की रोशनी धीरे-धीरे फीकी पड़ रही है। मंचों से बहते लंबे भाषण, नारों की गूंज और विज्ञापनों की चकाचौंध ने जनहित को इस कदर ढक दिया है कि आम आदमी की असल समस्याएं हाशिये पर सिमटती जा रही हैं। सवाल अब यह नहीं रह गया कि कितनी बातें कही गईं, बल्कि यह है कि उन बातों का जमीन पर कितना असर दिखा।
आज हर घोषणा को उपलब्धि के रूप में पेश किया जा रहा है। योजनाएं शुरू होने से पहले ही सफल घोषित कर दी जाती हैं।आंकड़ों की बाजीगरी से तस्वीरें तो सज जाती हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई जस की तस खड़ी रहती है। महंगाई की मार से जूझता परिवार, रोजगार की तलाश में भटकता युवा, बदहाल शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं की जर्जर हालत—इन सवालों के जवाब भाषणों में कम और वादों में ज्यादा मिलते हैं। राजनीति का यह नया चलन लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है, जहां जवाबदेही की जगह बयानबाजी ने ले ली है। सत्ता का संवाद जनता से कम और प्रचार से अधिक होता जा रहा है। जिन मुद्दों पर गंभीर विमर्श और ठोस कार्रवाई होनी चाहिए, वे शोर-शराबे और सुर्खियों में दबा दिए जाते हैं। नीतियां जनजीवन को राहत देने के बजाय प्रचार का माध्यम बनती प्रतीत होती हैं।
लोकतंत्र की आत्मा शब्दों में नहीं, जनहित में बसती है। यदि सरकारें अपनी सफलता का पैमाना केवल भाषणों और नारों को बनाती रहीं, तो जनता का भरोसा टूटना तय है। विकास का अर्थ केवल सड़कें, भवन या योजनाएं नहीं, बल्कि पारदर्शिता, संवेदनशीलता और भरोसा भी है।यह लेख सत्ता को आईना दिखाता है—कि शब्दों की चमक क्षणिक होती है, लेकिन जनहित की उपेक्षा स्थायी नुकसान छोड़ जाती है। अब वक्त है कि शासन चकाचौंध से बाहर निकलकर जमीन पर उतरे, क्योंकि जब शब्द थक जाते हैं, तब सच बोलता है—और वही सच लोकतंत्र की असली कसौटी है।
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