फागुन, होली और राजनीति के रंग: पटना में नितिन नवीन के स्वागत ने बदली ‘काले रंग’ की परिभाषा
पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)फागुन का महीना है, यानी होली का मौसम। होली रंगों का पर्व है, लेकिन आज के समय में रंग सिर्फ खुशियों और उल्लास तक सीमित नहीं रह गए हैं। समाज, मजहब और राजनीति—तीनों ने अपने-अपने रंग तय कर लिए हैं। हरा इस्लाम से, भगवा सनातन से और नीला सामाजिक न्याय की राजनीति से जोड़ा जाने लगा है। राजनीतिक दलों में भी रंग पहचान बन चुके हैं—भगवा भाजपा का, हरा आरजेडी और टीएमसी का, काला-लाल वामपंथ और डीएमके का प्रतीक है।
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इन्हीं तयशुदा धारणाओं के बीच सोमवार को पटना के बापू सभागार में एक ऐसा दृश्य सामने आया, जिसने रंगों के मायने बदल दिए। मौका था भारतीय जनता पार्टी के नवनियुक्त राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के भव्य स्वागत का। राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद यह उनका पहला पटना दौरा था। पूरा सभागार भगवा रंग में डूबा हुआ था—मंच से लेकर दर्शक दीर्घा तक भगवा गमछे, पटके और झंडे लहरा रहे थे।
उत्साह अपने चरम पर था। कार्यकर्ता ‘मोदी स्टाइल’ में जो हाथ में आया, उसे लहराते दिखे। इसी भगवामय माहौल के बीच अचानक एक काला गमछा भी लहराता नजर आया। सैकड़ों भगवा प्रतीकों के बीच वह अलग जरूर दिखा, लेकिन उसका मतलब विरोध नहीं था। वह भी समर्थन का ही रंग बन गया। यह दृश्य बताता है कि भावनाएं रंग नहीं देखतीं—कार्यकर्ता के पास जो था, वही समर्थन में लहरा दिया गया। उस पल काला रंग भी समर्थन का प्रतीक बन गया।
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नितिन नवीन पटना आगमन पर एयरपोर्ट से ही उत्सव का माहौल बन गया। ढोल-नगाड़ों, फूल-मालाओं और नारों के बीच कार्यकर्ताओं ने उनका जोरदार स्वागत किया। स्वागत के दौरान “जोड़ी मोदी-नीतीश के हिट हो गइल” गीत बजा, जिसने माहौल को पूरी तरह उत्सव में बदल दिया। एयरपोर्ट से शहर तक जगह-जगह स्वागत पोस्टर लगाए गए थे। बाइक रैली निकाली गई, जिसमें बड़ी संख्या में कार्यकर्ता शामिल हुए।
बापू सभागार में आयोजित अभिनंदन समारोह में बिहार के सभी जिलों से हजारों कार्यकर्ता पहुंचे। नितिन नवीन ने कार्यकर्ताओं से संवाद करते हुए संगठन को जमीनी स्तर पर और मजबूत करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भाजपा की ताकत उसका कार्यकर्ता है और यही शक्ति चुनावी सफलता की कुंजी बनती है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष संजय सरावगी ने इसे बिहार और संगठन के लिए गर्व का क्षण बताया।
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यह कार्यक्रम सिर्फ एक स्वागत समारोह नहीं था, बल्कि राजनीति में रंगों की जड़ हो चुकी धारणाओं को तोड़ने वाला संदेश भी था। फागुन के रंगों ने बता दिया कि समर्थन और विश्वास किसी एक रंग के मोहताज नहीं होते। जब भावनाएं साथ हों, तो हर रंग अपना हो जाता है।
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