स्वास्थ्य के नाम पर निजीकरण का खेल

✍️ लेखक: संजय पराते


सरकार आदिवासी हितों की बड़ी-बड़ी बातें करती है, लेकिन बजट और नीतियों की परतें जैसे-जैसे खुलती हैं, यह साफ़ होता जाता है कि विकास का मौजूदा मॉडल कॉरपोरेट केंद्रित है, न कि आदिवासी कल्याण आधारित। संसद में पेश बजट के आँकड़े बताते हैं कि आदिवासियों के नाम पर योजनाएँ तो हैं, पर ज़मीन पर उनका असर बेहद सीमित है।
योजना आयोग के निर्देश के अनुसार अनुसूचित जनजातियों पर कुल बजट का 8.6 प्रतिशत खर्च होना चाहिए, लेकिन 2025-26 में यह घटकर मात्र 2.58 प्रतिशत रह गया। इतना ही नहीं, जो राशि काग़ज़ों पर दिखाई गई, उसका बड़ा हिस्सा खर्च ही नहीं हुआ। लगभग 1.3 लाख करोड़ रुपये के आबंटन में से हज़ारों करोड़ रुपये बिना उपयोग लौट गए। यह स्थिति आदिवासी विरोधी नीतियों की ओर इशारा करती है।
आईआईटी जैसे संस्थानों में अनुसूचित जनजाति छात्रों के नाम पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च दिखाए गए, जबकि वास्तविकता यह है कि कई संस्थानों में इन छात्रों की भागीदारी तय आरक्षण से बहुत कम है। इसी तरह सेमीकंडक्टर इकाइयों और निजी क्षेत्र की परियोजनाओं को भी आदिवासी कल्याण के खाते में जोड़ दिया गया, जिसका उनसे कोई सीधा संबंध नहीं है।

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जनमन योजना और धरती आबा अभियान: नाम बड़े, काम छोटे
पीवीटीजी समुदायों के लिए घोषित जनमन योजना और धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान में भी यही कहानी दोहराई गई। घोषित बजट का बड़ा हिस्सा खर्च नहीं हुआ, जिससे स्पष्ट है कि ये योजनाएँ प्राथमिकता में नहीं हैं।
एकलव्य स्कूल और छात्रवृत्ति: वादों की पोल
एकलव्य विद्यालयों के लिए आवंटित धन का पूरा उपयोग नहीं हुआ। सैकड़ों स्कूल अब भी अधूरे हैं या शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति की राशि का भी बड़ा हिस्सा खर्च नहीं किया गया। यह सब आदिवासी शिक्षा के प्रति सरकारी उदासीनता को दर्शाता है।
देश में बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था
हाल की मीडिया रिपोर्टें बताती हैं कि कैसे गरीब परिवार इलाज के खर्च में टूट जाते हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सरकार का खर्च जीडीपी का सिर्फ 1.5 प्रतिशत है, जिसके कारण निजी अस्पतालों पर निर्भरता बढ़ी है। नतीजा यह है कि हर साल करोड़ों लोग स्वास्थ्य खर्च के कारण गरीबी में धकेले जा रहे हैं।

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स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण, बीमा आधारित मॉडल और कॉरपोरेट अस्पतालों का विस्तार दो-स्तरीय व्यवस्था को मज़बूत कर रहा है—जहाँ अमीरों को बेहतर इलाज और आम जनता को अपर्याप्त सुविधाएँ मिलती हैं। इसका सबसे गहरा असर आदिवासी और दलित समुदायों पर पड़ता है।
नीति बदलाव की ज़रूरत
स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार बनाने, सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाकर जीडीपी का कम से कम 5 प्रतिशत करने, निजी अस्पतालों को सख़्ती से नियंत्रित करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य ढाँचे को मज़बूत करने की ज़रूरत है। तभी एक न्यायपूर्ण और समावेशी स्वास्थ्य प्रणाली संभव है।

Editor CP pandey

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