मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का संदेश, पारिवारिक अपेक्षाओं और सामाजिक भेदभाव पर किया प्रहार
देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। बच्चों पर माता-पिता की अपेक्षाओं का बढ़ता दबाव, मानसिक समस्याओं की अनदेखी और लड़कियों पर घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। इन गंभीर मुद्दों को लेकर विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर शनिवार, 10 अक्टूबर को मनोविज्ञान विभाग के सौजन्य से जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें छात्र-छात्राओं ने प्रभावशाली नुक्कड़ नाटक के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े सामाजिक, पारिवारिक और व्यक्तिगत पहलुओं को उजागर किया।नुक्कड़ नाटक में दिखाया गया कि बच्चों पर अपनी इच्छाएं थोपना, हर क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करने की अपेक्षा रखना और दूसरों की उम्मीदों पर खरा उतरने का दबाव उनके मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। वहीं, लड़कियों पर कम उम्र से ही घरेलू कामकाज की जिम्मेदारियां डालकर उनके बचपन और व्यक्तिगत विकास के अवसरों को सीमित करने जैसे मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया गया।प्रस्तुति के माध्यम से छात्र-छात्राओं ने बताया कि अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाना, लगातार तनाव में रहना और मानसिक परेशानियों को छिपाना व्यक्ति के लिए गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है। इसके साथ ही एडीएचडी, चिंता और अवसाद जैसी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया गया। नाटक ने दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर किया कि मानसिक स्वास्थ्य केवल व्यक्ति का निजी विषय नहीं, बल्कि परिवार और समाज की भी सामूहिक जिम्मेदारी है।मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता जरूरी : डॉ. तूलिका पांडेमनोविज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. तूलिका पांडे ने कहा कि वर्तमान समय में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बेहद आवश्यक है। जागरूकता की कमी के कारण अनेक लोग अवसाद, चिंता, हीनभावना और कुंठा जैसी समस्याओं से जूझते रहते हैं। कई बार समय पर सहायता और उचित मार्गदर्शन नहीं मिलने से परिस्थितियां गंभीर हो जाती हैं। उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का संदेश स्कूल, कॉलेज, कार्यालय और घर सहित समाज के प्रत्येक स्तर तक पहुंचाना जरूरी है।मन की समस्याओं को समझना भी जरूरी : डॉ. शगुफ्ता अफरोजमनोविज्ञान विभाग की डॉ. शगुफ्ता अफरोज ने कहा कि जिस प्रकार शारीरिक समस्याओं के प्रति सजग रहना जरूरी है, उसी प्रकार मानसिक परेशानियों को समझना भी आवश्यक है। मानसिक समस्याओं को छिपाने या नजरअंदाज करने के बजाय उनके बारे में खुलकर बात करनी चाहिए। जरूरत पड़ने पर उचित सहायता और मार्गदर्शन लेने से समस्याओं का बेहतर ढंग से सामना किया जा सकता है।मानसिक समस्याओं से जूझ रहे लोगों के प्रति संवेदनशील बने समाज : प्रो. अरविंद कुमारभूगोल विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अरविंद कुमार ने कहा कि समाज में अनेक लोग मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझते हैं, लेकिन सामाजिक धारणाओं और भेदभाव के डर से वे अपनी परेशानी स्वीकार करने या सहायता लेने से हिचकिचाते हैं। मानसिक समस्याओं से जूझ रहे लोगों को हेय दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति भी इस स्थिति को गंभीर बनाती है। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों के प्रति संवेदनशीलता, समझ और स्वीकार्यता का भाव विकसित करने की आवश्यकता है, ताकि वे बिना किसी संकोच के अपनी समस्याएं साझा कर सकें।छात्र-छात्राओं ने नुक्कड़ नाटक से दिया जागरूकता का संदेशनुक्कड़ नाटक में रहनुमा खातून, अर्यमा त्रिपाठी, अभिलाषा, शमा परवीन, सोनम कुमारी, सुगंधा यादव, चंदा यादव, रोशनी मनी, सिब्बू पांडे, विश्वेश्वर, माही यादव और शीतल कुमारी ने भाग लिया। विद्यार्थियों ने अपनी प्रस्तुति के माध्यम से बच्चों पर अनावश्यक अपेक्षाओं का दबाव डालने, मानसिक समस्याओं की अनदेखी करने और लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देने जैसी प्रवृत्तियों पर गंभीरता से विचार करने का संदेश दिया।कार्यक्रम में प्रोफेसर वाचस्पति द्विवेदी, प्रोफेसर अरविंद कुमार, प्रोफेसर भूपेश मणि, विवेक मिश्रा, डॉ. तूलिका पांडे, डॉ. शगुफ्ता अफरोज, मंतोष मौर्या, राजकुमार गुप्ता, कृष्ण मुरारी, अवनीश राव, ऋचा मिश्रा, मनोज कुमार मिश्र, उमेश दुबे, तेजी प्रताप, विनय, अनिल और कमलेश सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।कार्यक्रम के माध्यम से संदेश दिया गया कि मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बातचीत करना, परेशानियों को गंभीरता से समझना और जरूरतमंद लोगों को सहयोग देना स्वस्थ एवं संवेदनशील समाज के निर्माण के लिए आवश्यक है।
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