कागज़ों में योजनाएं, ज़मीन पर संघर्ष: बीसवां गांव की हकीकत

नहर किनारे झोपड़ी में गुजर रही ज़िंदगी: महाराजगंज के बीसवां गांव में 30 सदस्यीय कुनबा आज भी सरकारी योजनाओं से वंचित


महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)।सदर तहसील क्षेत्र के ग्राम पंचायत बीसवां में विकास और कल्याणकारी योजनाओं के सरकारी दावों को चुनौती देती एक बेहद मार्मिक और चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। नहर के किनारे वर्षों से झुग्गी-झोपड़ी में रह रहे 60 वर्षीय लालजी पुत्र सुखल अपने छह बेटों और लगभग 30 सदस्यीय परिवार के साथ आज भी बुनियादी सुविधाओं से पूरी तरह वंचित हैं। न उनके पास अपनी जमीन है, न पक्का मकान और न ही किसी सरकारी योजना का लाभ।
सरकार द्वारा गरीबों और वंचितों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना, राशन कार्ड, वृद्धावस्था पेंशन, आयुष्मान भारत योजना जैसी कई महत्वाकांक्षी योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन बीसवां गांव का यह कुनबा अब तक प्रशासनिक नजर से ओझल बना हुआ है। परिवार की आजीविका का एकमात्र साधन भिक्षाटन है। लालजी रोज़ाना आसपास के इलाकों में भीख मांगकर किसी तरह परिवार का पेट पालने की कोशिश करते हैं।

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नहर के किनारे बनी अस्थायी झोपड़ी में रहना हमेशा खतरे से खाली नहीं है। बरसात में बाढ़ का डर, गर्मी में तेज धूप और सर्दियों में ठिठुराने वाली ठंड इस परिवार की दिनचर्या का हिस्सा बन चुकी है। बच्चों और बुजुर्गों की हालत सबसे ज्यादा दयनीय है। न तो बच्चों की नियमित शिक्षा की व्यवस्था है और न ही स्वास्थ्य सुविधाओं तक उनकी पहुंच।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्रशासन समय रहते इस परिवार को आवासीय पट्टा, पक्का मकान और सरकारी योजनाओं से जोड़ दे, तो उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव आ सकता है। सवाल यह उठता है कि जब सरकार “सबका साथ, सबका विकास” की बात करती है, तो फिर ऐसे परिवार विकास की मुख्य धारा से बाहर क्यों रह जाते हैं।
यह मामला न केवल प्रशासनिक संवेदनशीलता की परीक्षा है, बल्कि ग्रामीण स्तर पर योजनाओं के क्रियान्वयन की वास्तविक स्थिति को भी उजागर करता है। अब देखने वाली बात यह होगी कि इस खबर के सामने आने के बाद संबंधित अधिकारी संज्ञान लेते हैं या फिर यह परिवार यूं ही अभाव, उपेक्षा और असुरक्षा के साए में जीवन बिताने को मजबूर रहेगा।

Editor CP pandey

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