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हमारा अतीत, वर्तमान और भविष्य, तीनों अयोध्या में समाहित : प्रो.पूनम टंडन

त्याग, बलिदान, मर्यादा व पहचान की पावन नगरी है अयोध्या: प्रो.राजवंत राव

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। ” साहित्य एवं पुरातत्व के आलोक में अयोध्या परिक्षेत्र का इतिहास ” विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन शुक्रवार को दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के संवाद भवन में अयोध्या अध्ययन केंद्र, प्राचीन इतिहास विभाग के तत्वावधान में हुआ। राष्ट्रीय संगोष्ठी भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली तथा अंतर्राष्ट्रीय रामायण एवं वैदिक शोध संस्थान द्वारा वित्त पोषित है।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रोफेसर पूनम टंडन ने कहा कि। अयोध्या आस्था का केंद्र है। आस्था, आध्यात्मिकता और वैज्ञानिक सोच के साथ अयोध्या पर शोध करने की आवश्यकता है। अयोध्या में हमारा अतीत वर्तमान व भविष्य तीनों समाहित है। अयोध्या धर्म, संस्कृति व संस्कार का एक ऐसा सनातन प्रकाश स्तंभ है, जिससे भारत अनवरत प्रकाशमान है।
अयोध्या अध्ययन केंद्र के निदेशक एवं कला संकाय के अधिष्ठाता, इतिहासविद प्रो. राजवंत राव ने उद्घाटन सत्र का विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि अयोध्या मोक्षदायिनी सप्तपुरियों में से एक प्रमुख पुरी है। भारत देश की निर्मिति में सांस्कृतिक केंद्रों का बड़ा योगदान रहा है। प्राचीन भारत में अनेक सांस्कृतिक केंद्र रहे हैं। जिनमें सिंह सारस्वत केंद्र, हस्तिनापुर केंद्र, कोशल एवं विदेह का क्षेत्र रहा है। इसी कोशल एवं विदेह की अंतर्वेदी धारा में ब्राह्मण एवं श्रमण संस्कृतियों के केंद्र के रूप में अयोध्या नगर विद्यमान रहा है। अयोध्या राग— विराग का केंद्र है। रामकथा का उल्लेख वेद से लेकर पउमचरिउ तक मिलता है। राम का कुछ ऐसा प्रभाव है कि सभी राजा अपनी तुलना राम से करते हैं। उन्होंने कहा कि त्याग, बलिदान, मर्यादा व पहचान की नगरी है अयोध्या।
सारस्वत अतिथि अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय ने कहा कि अयोध्या एक ऐसा नगर है जो वैदिक रूप में बसा है। इसका उल्लेख अथर्ववेद में है। जो आठ चक्रों से घिरा तथा आनंद व प्रकाश दोनों का समन्वय करता है। पूरे देश के नगर नियोजन में अयोध्या के स्थापत्य को मानक के रूप में लिया जा सकता है। उन्होंने साहित्यिक स्रोतों का उल्लेख करते हुए कहा कि अयोध्या कई धर्मों के उदय का स्थल है।
बीज वक्तव्य प्रो. प्रशांत श्रीवास्तव, मुख्य अतिथि, पूर्व आचार्य, प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ ने कहा कि वाल्मीकि रामायण में उल्लिखित अलग – अलग कांड अपनी विशिष्टता के लिए जाने जाते हैं। अयोध्या कांड में मानव पात्रों का प्राधान्य है। किष्किंधा कांड में वानरों का प्राधान्य है। लंका कांड में राक्षस पात्रों का प्राधान्य है। उन्होंने अयोध्या का संस्थापक मनु को और अयोध्या का नंदीग्राम से गहरा संबंध बताया।
विशिष्ट अतिथि डॉ. ओम जी उपाध्याय, सदस्य सचिव, भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली ने कहा कि इतिहास की विकृतियां समाप्त करना हमारा उद्देश्य है। विक्रमादित्य ने अयोध्या को सबसे ज्यादा ऊर्जावान क्षेत्र घोषित किया। वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में अयोध्या का विस्तृत वर्णन है। जानकी हरण में अयोध्या के घरों की आभा का वर्णन है। थाईलैंड के राजा ने राम की अवधारणा को ग्रहण किया। दक्षिण कोरिया के राजवंश राम को अपना पूर्वज मानते हैं। म्यांमार के कई लोकगीतों में राम का अद्भुत वर्णन है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि आइन-ए-अकबरी में भी अयोध्या का उल्लेख मिलता है।
प्राचीन इतिहास विभाग की अध्यक्ष प्रोफेसर प्रज्ञा चतुर्वेदी ने स्वागत वक्तव्य दिया। उक्त कार्यक्रम में कन्हैया सिंह एवं शिवम कुमार मिश्र की पुस्तकों का लोकार्पण हुआ। लोकर्पित पुस्तकों का शीर्षक क्रमशः ‘प्राचीन भारतीय मुद्राओं पर अभिव्यक्त धार्मिक प्रतीक’ एवं ‘वैष्णव आगमों में वैष्णवी भक्ति के विविध आयाम’ है। कार्यक्रम का कुशल संचालन विभाग की सहायक आचार्य पद्मजा सिंह ने किया।
कार्यक्रम के अंत में प्रो. शीतला प्रसाद सिंह ने सम्मानित अतिथियों, मीडियाकर्मी एवं छात्र-छात्राओं के प्रति आभार व्यक्त किया।

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