ॐ : एक नाद, जिसमें समाई है सृष्टि की सम्पूर्ण चेतना

जहां ध्वनि मौन में विलीन होकर साधना का परम लक्ष्य बन जाती है

कैलाश सिंह

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में ‘ॐ’ को केवल एक अक्षर, मंत्र या धार्मिक प्रतीक के रूप में नहीं देखा गया है, बल्कि इसे सम्पूर्ण सृष्टि की मूल चेतना और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का आदि नाद माना गया है। वेदों, उपनिषदों, योगसूत्रों और गीता तक में ‘ॐ’ की महत्ता को अत्यंत गूढ़ और व्यापक रूप में स्वीकार किया गया है। यह वही नाद है, जिससे सृष्टि की उत्पत्ति मानी गई और जिसमें अंततः सब कुछ विलीन हो जाता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से ‘ॐ’ ब्रह्म का प्रतीक है—वह परम सत्य, जो निराकार, निर्विकार और शाश्वत है। साधना की परंपरा में ‘ॐ’ केवल जप का विषय नहीं, बल्कि स्वयं साधना की प्रक्रिया और उसका अंतिम लक्ष्य भी है। यही कारण है कि इसे साधना भी कहा गया है और साध्य भी।
योग और ध्यान की परंपरा में ‘ॐ’ का उच्चारण मन, प्राण और चेतना को एक ही लय में स्थापित करने का कार्य करता है। जब साधक एकाग्रचित्त होकर ‘ॐ’ का जप करता है, तो उसकी ध्वनि-तरंगें केवल कानों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि पूरे शरीर में कंपन उत्पन्न करती हैं। यह कंपन शरीर की प्रत्येक कोशिका को स्पर्श कर मानसिक तनाव, चंचलता और विक्षेप को शांत करता है। परिणामस्वरूप मन स्थिर होता है और चेतना भीतर की ओर प्रवाहित होने लगती है।
आध्यात्मिक विद्वानों के अनुसार ‘ॐ’ के तीन स्वर—अ, उ और म—सृष्टि के तीन मूल सिद्धांतों के प्रतीक हैं। ‘अ’ सृष्टि की उत्पत्ति का द्योतक है,
‘उ’ सृष्टि के पालन और संतुलन का संकेत देता है,
और ‘म’ सृष्टि के लय अर्थात् अंत का प्रतीक माना जाता है। इन तीनों के बाद आने वाला मौन ही ‘ॐ’ की वास्तविक पूर्णता है। यही मौन वह अवस्था है, जहां शब्द समाप्त हो जाते हैं और अनुभूति आरंभ होती है। इसी मौन में साधक आत्मबोध की अनुभूति करता है और अहंकार का विसर्जन होकर आत्मा का ब्रह्म से साक्षात्कार संभव होता है। यही साधना की पराकाष्ठा मानी गई है।
आज के भौतिकतावादी, भागदौड़ भरे और तनावग्रस्त जीवन में ‘ॐ’ साधना की प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ जाती है। प्रतिस्पर्धा, असुरक्षा, अवसाद और मानसिक अस्थिरता से जूझते आधुनिक समाज के लिए ‘ॐ’ का जप एक सरल, सहज और प्रभावी आध्यात्मिक उपाय के रूप में सामने आया है। यही कारण है कि योग शिविरों, ध्यान केंद्रों, आश्रमों और आध्यात्मिक आयोजनों में ‘ॐ’ का सामूहिक उच्चारण विशेष महत्व रखता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित रूप से ‘ॐ’ का जप करने से न केवल मानसिक शांति प्राप्त होती है, बल्कि व्यक्ति के व्यवहार में भी सकारात्मक परिवर्तन आने लगता है। क्रोध, ईर्ष्या और असंतोष जैसी प्रवृत्तियां धीरे-धीरे क्षीण होती हैं और उनके स्थान पर करुणा, संयम, धैर्य और विवेक का विकास होता है।
संत-महात्माओं का यह भी कहना है कि जब साधक बाहरी आडंबरों, दिखावे और भौतिक आकर्षणों से ऊपर उठकर ‘ॐ’ को अपने जीवन का आधार बना लेता है, तब उसके लिए साधना किसी विशेष समय या स्थान की मोहताज नहीं रहती। उसका संपूर्ण जीवन ही साधना बन जाता है। यही जीवन-दृष्टि व्यक्ति को भीतर से समृद्ध करती है और समाज को नैतिक एवं मानवीय मूल्यों की नई दिशा प्रदान करती है।
निष्कर्षतः यह कहना पूर्णतः समीचीन होगा कि ‘ॐ’ ही साधना का वह परम लक्ष्य है, जहां पहुंचकर साधक को कुछ पाने की लालसा नहीं रहती। वहां न चाह शेष रहती है, न भय—केवल आत्मिक पूर्णता और शांति का अनुभव होता है। यही भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का शाश्वत, सार्वकालिक और सार्वभौमिक संदेश है।

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