आज-प्रसंग (03 नवम्बर) पर जन्मे पाँच महानुभावों एक दृष्टि। इनके जीवन-संग्राम, स्थान, दृष्टि व योगदान हमें शिक्षा-जीवन में सशक्त प्रेरणा देते हैं।
१. सवाई जयसिंह II (३ नवम्बर १६८८)
जन्म 03 नवम्बर 1688 को अमेर (वर्तमान जयपुर, राजस्थान) में हुआ था। बाल्यकाल में ही, लगभग 11 वर्ष की आयु में पिता की मृत्यु के बाद राजत्व प्राप्त किया।
उन्होंने राजनैतिक कूटनीति, भू-सैन्य व्यवस्था तथा खगोल विज्ञान / अभियोंत्रिकी में अद्भुत रुचि दिखाई। जयपुर-नगर का प्रथम-रूपांतरण तथा वेधशालाएँ (जैसे जंतर मंतर, जयपुर) स्थापना का श्रेय उन्हें है।
शिक्षण-संदेश: नेतृत्व मात्र वंश-संपत्ति से नहीं, अध्ययन-विवेचना-नवीनता से तैयार होता है। जयसिंह II का जीवन हमें “शिक्षा + नवोन्मेष” के संयोजन की प्रेरणा देता है।
२. पृथ्वीराज कपूर (३ नवम्बर १९०६)
03 नवम्बर 1906 को समुंद्रि (अब पाकिस्तान) में जन्मे। हिन्दी रंगमंच एवं फिल्म जगत के पायनियर माने जाते हैं। उन्होंने 1944 में मुंबई (जुहू) स्थित पृथ्वी थिएटर की स्थापना की।
उनका योगदान सिर्फ अभिनय तक सीमित नहीं रहा — उन्होंने भारतीय रंग-मंच को संगठित किया, अभिनय-शिक्षा को जन-मानस तक पहुँचाया।
शिक्षण-संदेश: कला-शिक्षा का विस्तार-जेवर समाज-सुधार का रूप ले सकती है। पृथ्वीराज कपूर का जीवन हमें सिखाता है कि “रंगमंच = शिक्षा + सामाजिक सहभागिता” हो सकती है।
३. लक्ष्मीकांत (संगीतकार) (३ नवम्बर १९३७)
03 नवम्बर 1937 को बंबई (मुम्बई) में जन्मे, वे संगीत-जुगलबन्दी Laxmikant–Pyarelal के “लक्ष्मीकांत” भाग थे। गरीबी में जन्मकर उन्होंने संगीत-अध्ययन कर अपनी पहचान बनाई।
करीब 750 से अधिक फिल्मों में संगीत देने वाले इस जोड़ी ने हिन्दी सिनेमा की धरोहर संगीतमय बनाई।
शिक्षण-संदेश: कठिन-परिस्थितियों में भी निरन्तर अभ्यास और समर्पण से शिक्षा-शक्ति बनती है। संगीत-शिक्षण जीवन-शिक्षा बन सकती है।
४. अमर्त्य सेन (३ नवम्बर १९३३)
03 नवम्बर 1933 को शांतिनिकेतन (पश्चिम बंगाल) में जन्मे। अर्थशास्त्र व दर्शनशास्त्र के विद्वान, इन्हें 1998 में अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ।
उनका अध्ययन-पथ कलकत्ता, केम्ब्रिज, आक्सफोर्ड और हार्वर्ड तक गया। उन्होंने “भुखमरी के कारण”, “मानव-क्षमता” जैसे सामाजिक विषयों पर शोध किया।
शिक्षण-संदेश: शिक्षा-शुद्ध शोध और सामाजिक जागरूकता से मानव-उन्नति संभव है। अमर्त्य सेन का जीवन हमें बताता है कि “शिक्षा मात्र संख्या नहीं, चिंतन-परिवर्तन है।”
५. मानवजीत सिंह संधू (३ नवम्बर १९७६)
03 नवम्बर 1976 को भारत के गोलीबाजि खिलाड़ी के रूप में जन्मे। उन्होंने ट्रैप शूटिंग में देश को गौरव-शाली बनायाः विश्व चैंपियन व विश्व रैंक नंबर 1 रह चुके।
उनका संघर्ष, निरन्तर अभ्यास और उत्कृष्टता-प्राप्ति हम सबके लिए शिक्षा-प्रेरणा है।
शिक्षण-संदेश: शिक्षा ही नहीं, निरन्तर अभ्यास और प्रतिदिन सुधार की चाह ही महान उपलब्धि की नींव है। मानवजीत सिंह का जीवन हमें बताता है कि “शिक्षा + अभ्यास = उत्कृष्ठता”।
03 नवम्बर को जन्मे ये पाँच-महान व्यक्ति — सवाई जयसिंह II, पृथ्वीराज कपूर, लक्ष्मीकांत, अमर्त्य सेन, मानवजीत सिंह संधू — भिन्न-भिन्न क्षेत्रों (राजनैतिक-शासन, रंगमंच-सिनेमा, संगीत, अर्थशास्त्र, खेल) में अपनी-अपनी छाप छोड़ गए। पर उनसे एक साझा सूत्र मिलता है: शिक्षा का संस्कार, निरन्तर अभ्यास, और सामाजिक-उद्देश्य।
आज-यदि हम अपने अध्ययन-पथ, जीवन-लक्ष्यों, सामाजिक दायित्वों को देखें — तो इन पाँचों की कथा-प्रेरणा हमें याद दिलाती है कि केवल “ज्ञानी होना” पर्याप्त नहीं, बल्कि “ज्ञान को क्रियाशील बनाना” है। शिक्षा का समग्र अर्थ तभी पूरा होता है जब वह जीवन-परिवर्तन-वरदान बन जाए।
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