विकास की दौड़ में बर्बाद हो रही प्रकृति: चेतावनी का आखिरी संकेत

राष्ट्र की परम्परा डेस्क से – सोमनाथ मिश्र

तेजी से बदलती जीवनशैली, अंधाधुंध विकास, बढ़ती आबादी और संसाधनों के अत्यधिक दोहन ने आज पूरे विश्व को एक गंभीर पर्यावरण संकट की ओर धकेल दिया है। प्राकृतिक संसाधन, जो कभी मानव जीवन का आधार हुआ करते थे, आज खतरे में हैं। जल, जंगल और जमीन—ये तीनों स्तंभ हमारे जीवन को संतुलित रखने का कार्य करते हैं, लेकिन वर्तमान समय में इन्हीं पर सबसे बड़ा संकट मंडरा रहा है।

आज आधुनिक विकास की दौड़ में शहर कंक्रीट के जंगलों में बदल चुके हैं। पेड़ों की जगह ऊँची इमारतों ने ले ली है और नदियाँ नालों में तब्दील हो चुकी हैं। भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। जो जल कभी धरती की कोख में आसानी से मिल जाता था, आज उसे पाने के लिए सैकड़ों फीट गहरे बोरवेल खोदने पड़ रहे हैं। यह केवल किसी एक शहर या राज्य की समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश और दुनिया का सच बन चुका है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि भूमिगत जल का सबसे ज्यादा दोहन कृषि, उद्योग और शहरी आवश्यकताओं के लिए किया जाता है, लेकिन इसकी भरपाई के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं हो रहे हैं। बारिश का जल जो कभी जमीन में समाकर जलस्तर को संतुलित करता था, अब कंक्रीट और डामर की परतों के कारण बहकर नालों में चला जाता है। यही वजह है कि सूखे की समस्या हर साल और विकराल रूप लेती जा रही है।

दूसरी ओर, बढ़ता वायु प्रदूषण भी जीवन के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरा है। महानगरों की हवा सांस लेने योग्य नहीं रही। वाहनों का धुआँ, फैक्ट्रियों से निकलने वाला विषैला गैस, पराली जलाने की समस्या और निर्माण कार्यों की धूल ने वातावरण को जहरीला बना दिया है। स्थिति यह हो गई है कि कई शहरों में सुबह की ताजी हवा भी अब सिर्फ एक कल्पना बनकर रह गई है। हवा में मौजूद सूक्ष्म कण (PM2.5 और PM10) फेफड़ों, हृदय और त्वचा संबंधी गंभीर रोगों को जन्म दे रहे हैं।

इसके साथ ही लगातार कम होते जंगल भी पर्यावरण असंतुलन का प्रमुख कारण बनते जा रहे हैं। वृक्ष केवल ऑक्सीजन ही नहीं देते, बल्कि जलवायु को संतुलित रखने, वर्षा चक्र को नियमित करने और जैव विविधता को सुरक्षित रखने में भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। जब जंगल काटे जाते हैं तो कई जीव-जंतु और पक्षियों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो जाता है। इससे पूरा पारिस्थितिकी तंत्र डगमगा जाता है।

आज विश्व भर में हजारों प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं। यह केवल एक पर्यावरणीय नहीं, बल्कि एक नैतिक संकट भी है। क्योंकि मानव अपने लाभ के लिए प्रकृति का इतना अधिक शोषण कर चुका है कि संतुलन पूरी तरह बिगड़ने लगा है।

ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन भी इसी पर्यावरण संकट के परिणाम हैं। तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं, समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और प्राकृतिक आपदाओं में बढ़ोतरी हो रही है। कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा, कहीं तूफान तो कहीं जंगल में भयानक आग—ये सब प्रकृति के उस असंतुलन का संकेत हैं जिसे मानव ने स्वयं उत्पन्न किया है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ बचा पाएंगे? यदि यही स्थिति रही, तो आने वाला समय केवल जल संकट, खाद्य संकट और स्वास्थ्य संकट लेकर आएगा। बच्चों को स्वच्छ हवा, शुद्ध पानी और हरा-भरा वातावरण शायद केवल किताबों में ही देखने को मिले।

हालांकि अभी भी समय पूरी तरह हाथ से नहीं गया है। यदि सरकारें, संस्थान और आम नागरिक मिलकर प्रयास करें, तो स्थिति को सुधारा जा सकता है। वर्षा जल संचयन, वृक्षारोपण, प्लास्टिक का कम उपयोग, सौर और पवन ऊर्जा का बढ़ावा, सार्वजनिक परिवहन का प्रयोग और प्रदूषण नियंत्रण के सख्त नियम—ये सभी कदम पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

हर व्यक्ति को यह समझना होगा कि प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन है। यदि इसे नष्ट किया गया, तो मानव अस्तित्व भी संकट में पड़ जाएगा। यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति, संस्था या सरकार की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की है।

आज जरूरत है केवल चेतावनी सुनने की नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की। जल बचाना है, जंगल बचाने हैं और जमीन को जहरीला होने से रोकना है। तभी हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित, स्वस्थ और हरा-भरा भविष्य सौंप सकेंगे।

अब फैसला हमारे हाथ में है—
हम प्रकृति के रक्षक बनेंगे या उसके विनाश के गवाह।

rkpnews@somnath

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