केवट बोला हे अवधपुरी के श्रीराम,
तुम तो हो राजाओं के राजा राम,
गंगा पार कराऊँगा बस शर्त एक है,
चरण पखारूँगा मैं पहले यही टेक है।
तुम तो भव सागर के नाविक हो,
मैं निषाद गंगा तट का केवट हूँ,
चरणों के स्पर्श से नौका डूबेगी,
कैसे पार करा दूँ धारा, डरता हूँ।
हे राजन चरण धूलि धुलवाऊँगा,
तब आपको अपनी नाव चढ़ाऊँगा,
भवसागर तारनहार विष्णुअवतार,
गंगातट नाविक की करते मनुहार।
श्रीराम की माया श्रीराम ही जाने,
इसका रहस्य वह दोनों पहचाने,
मुसुकाये श्रीराम कहा ठीक है भाई
तमसा पार करा दो ले लो उतराई।
प्रभु चरण पखारि चढ़ाई नौका,
इस पार से दिया गंगा पार उतार,
उतराई न चाहूँ प्रभु रखिये उधार,
भवसागर से मुझे भी देना उबार।
सिय राम लखन सब दे उतराई रहें,
केवट कहे नाथ वापसी फिर आईये,
आदित्य विमल भक्ति का वर दीजिये,
मुझको निज चरण शरण ले लीजिये।
कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
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