नवनीत मिश्र
भारत की सांस्कृतिक परंपरा में लोहड़ी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सामूहिक आनंद, आभार और नए जीवन-चक्र के स्वागत का प्रतीक है। यह पर्व विशेष रूप से उत्तर भारत, खासकर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पूरे हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पूर्व आने वाली लोहड़ी शीत ऋतु के विदा होने और बसंत के आगमन की दस्तक मानी जाती है। लोहड़ी का केंद्र बिंदु अग्नि है। सांझ ढलते ही गांव-शहरों में खुले मैदानों, आंगनों और चौपालों पर लकड़ियों से अलाव जलाए जाते हैं। अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करते हुए लोग तिल, मूंगफली, रेवड़ी, गुड़ और पॉपकॉर्न अर्पित करते हैं। यह अग्नि को धन्यवाद देने और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की लोकपरंपरा है, जिसने पूरे वर्ष मानव जीवन का संरक्षण किया। इस पर्व का लोकजीवन और कृषि से गहरा संबंध है। रबी की फसलें खेतों में लहलहाने लगती हैं और किसानों के चेहरे पर संतोष की झलक दिखाई देती है। लोहड़ी श्रम, उम्मीद और समृद्धि के प्रतीक के रूप में किसानों को नए मौसम के लिए उत्साहित करती है। यही कारण है कि यह पर्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक चेतना से भी जुड़ा हुआ है। लोहड़ी की रौनक लोकगीतों और नृत्यों से और बढ़ जाती है। ढोल की थाप पर गिद्दा और भांगड़ा की मस्ती वातावरण को जीवंत कर देती है। पारंपरिक गीतों में वीरता, प्रेम, प्रकृति और सामाजिक एकता की गूंज सुनाई देती है। परिवार और समुदाय एक साथ मिलकर इस पर्व को मनाते हैं, जिससे आपसी संबंधों में मधुरता और सहयोग की भावना प्रबल होती है। आधुनिक समय में भी लोहड़ी की मूल आत्मा जीवित है। भले ही उत्सव के स्वरूप में कुछ परिवर्तन आए हों, लेकिन अग्नि के चारों ओर एकत्र होकर खुशियां बांटने की परंपरा आज भी लोगों को जोड़ती है। यह पर्व हमें यह सिखाता है कि सच्ची समृद्धि सामूहिक आनंद, प्रकृति के सम्मान और परस्पर सौहार्द में निहित है। लोहड़ी का पावन पर्व अतीत की लोकसंस्कृति से जोड़ते हुए भविष्य के प्रति आशा जगाता है। हर्ष, उल्लास और आस्था से परिपूर्ण यह पर्व भारतीय जीवन-मूल्यों और सांस्कृतिक एकता का सजीव उत्सव है।
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