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लाला हरदयाल : स्वतंत्रता की मशाल जलाने वाले अद्वितीय क्रांतिकारी

  • नवनीत मिश्र
  • भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल तलवार और रणभूमि की कहानियों से नहीं, बल्कि उन महान विचारों से भी भरा है जिन्होंने गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने की चेतना जगाई। ऐसे ही एक विराट व्यक्तित्व थे — लाला हरदयाल जी, जिनका जीवन त्याग, तपस्या और क्रांतिकारी विचारधारा का अद्भुत उदाहरण है। आज उनकी जयंती पर हम उस महापुरुष को नमन करते हैं जिन्होंने ग़ुलाम भारत के युवाओं में स्वतंत्रता की ज्वाला प्रज्वलित की।लाला हरदयाल जी का जन्म 14 अक्टूबर 1884 को दिल्ली में हुआ था। पिता गौरीदत्त जी ब्रिटिश सरकार में उच्च पद पर कार्यरत थे, किन्तु हरदयाल जी ने प्रारम्भ से ही औपनिवेशिक शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों के विरुद्ध मन में तीव्र असंतोष पाल लिया था। वे अत्यंत मेधावी छात्र थे— सेंट स्टीफन कॉलेज से प्रथम श्रेणी में स्नातक हुए और आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से छात्रवृत्ति मिली। परन्तु वहां जाकर भी उन्होंने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ आवाज उठाई और छात्रवृत्ति छोड़ दी। यह उनका पहला सार्वजनिक ‘विद्रोह’ था।लाला हरदयाल जी के जीवन का सबसे गौरवशाली अध्याय गदर आंदोलन से जुड़ा है। 1913 में अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में उन्होंने प्रवासी भारतीयों को संगठित कर ‘गदर पार्टी’ की स्थापना की। इसका उद्देश्य था — भारत में सशस्त्र क्रांति के माध्यम से अंग्रेजी शासन का अंत करना। उनके विचारों से प्रेरित होकर हजारों भारतीय मजदूर, किसान और छात्र ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ संगठित हुए। ‘गदर’ अख़बार उनकी क्रांतिकारी सोच का माध्यम बना, जो विदेशों में भी भारतीय स्वतंत्रता का घोष बन गया।लाला हरदयाल केवल राजनीतिक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि एक गहरे चिंतक और दार्शनिक भी थे। उनका मानना था कि स्वतंत्रता केवल शासन परिवर्तन से नहीं, बल्कि विचारों की शुद्धता और आत्मबल से प्राप्त होती है। वे पश्चिमी भौतिकवाद के आलोचक और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के समर्थक थे। उनका ग्रंथ “Hints for Self Culture” आज भी आत्मनिर्माण और राष्ट्रनिर्माण का प्रेरक ग्रंथ है।लाला हरदयाल जी ने अपने जीवन में सुख-सुविधाओं का पूर्ण त्याग किया। उन्होंने परिवार, पद, प्रतिष्ठा, सब कुछ देश के लिए अर्पित कर दिया। इंग्लैंड और अमेरिका में रहते हुए भी उनका हृदय भारत माता के लिए धड़कता रहा। वे मानते थे कि “राष्ट्र की सेवा ही सच्चा धर्म है।”लाला हरदयाल जी का निधन 4 मार्च 1939 को फिलाडेल्फिया में हुआ, परंतु उनकी विचारधारा आज भी स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता और राष्ट्र गौरव की प्रेरणा देती है। गदर पार्टी के नारे, उनके लेख, और उनका तपस्वी जीवन इस बात का प्रमाण हैं कि स्वतंत्रता केवल युद्धभूमि में नहीं, बल्कि विचारों की गहराई और आत्मबल में भी लड़ी जाती है।लाला हरदयाल जैसे महापुरुषों ने हमें यह सिखाया कि स्वतंत्रता का मूल्य त्याग और अनुशासन से चुकाना पड़ता है। उन्होंने जिस ज्योति को जलाया, वह आज भी हर देशभक्त हृदय में प्रज्वलित है।उनकी जयंती पर हम सभी को यह संकल्प लेना चाहिए कि—

“देश के हित में सोचें, बोलें और कर्म करें, क्योंकि सच्चा सम्मान स्वतंत्रता सेनानियों का तभी है जब हम उनके सपनों का भारत बनाएँ।”

rkpNavneet Mishra

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