क्या कद्दावर मंत्री के रसूख तले दब गई शिक्षक की ‘आखरी चीख’?
जीरो टॉलरेंस का निकला दम, DM की निलंबन रिपोर्ट पर कुंडली मारकर बैठा शासन; बिना ‘चार्ज’ और बिना ‘लीव’ फरार हुईं मैडम, क्या साक्ष्य मिटाने का दिया जा रहा है ‘सेफ पैसेज’?
गौरव कुशवाहा ,विशेष संवाददाता
लखनऊ / देवरिया (राष्ट्र की परम्परा) उत्तर प्रदेश की योगी सरकार का बुलडोजर क्या केवल गरीबों और लाचारों के लिए है? यह सवाल आज हर शिक्षक और नागरिक पूछ रहा है। शिक्षक कृष्ण मोहन सिंह आत्महत्या प्रकरण ने सूबे की जीरो टॉलरेंस नीति की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। सोमवार रात को ही जिलाधिकारी दिव्या मित्तल ने BSA शालिनी श्रीवास्तव की आपराधिक लापरवाही पर निलंबन की संस्तुति शासन को भेज दी थी, लेकिन 72 घंटे बीत जाने के बाद भी शासन स्तर पर फाइल का एक पन्ना तक नहीं सरका है। आखिर वो कौन सा अदृश्य हाथ है जो एक दागी अधिकारी को बचाने के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय के निर्देशों को भी ठेंगा दिखा रहा है?
कैबिनेट मंत्री का ‘वरदहस्त’ या सिस्टम की लाचारी?
लखनऊ के गलियारों से छनकर आ रही खबरें बेहद चौंकाने वाली हैं। सूत्रों का दावा है कि यूपी कैबिनेट के एक बेहद कद्दावर मंत्री ने आरोपी बीएसए के बचाव में मोर्चा खोल दिया है। चर्चा है कि इसी सियासी दबाव के कारण सचिवालय के आला अफसर कार्रवाई करने से थर्रा रहे हैं। क्या लोकतंत्र में एक मंत्री की जिद, एक निर्दोष शिक्षक की जान और उसकी विधवा के आंसुओं से भी बड़ी हो गई है? आखिर शासन उस वसूली सिंडिकेट को ऑक्सीजन क्यों दे रहा है जिसने विभाग को लूट का अड्डा बना दिया था?
भगोड़ी अधिकारी का
‘प्रशासकीय तांडव’: न चार्ज, न छुट्टी, फिर भी मौन है सरकार!
आरोपी बीएसए शालिनी श्रीवास्तव की धृष्टता देखिए वे सोमवार के बाद से जिला मुख्यालय से लापता हैं। सरकारी सेवा नियमावली को ठेंगा दिखाते हुए उन्होंने न तो किसी को विभागीय प्रभार सौंपा और न ही कोई वैधानिक अवकाश लिया। एक राजपत्रित अधिकारी का इस तरह भगोड़ा हो जाना उसकी अपराधिक मानसिकता को प्रमाणित करता है। दफ्तर में फाइलें लावारिस हैं, डिजिटल साक्ष्य खतरे में हैं, और शासन तमाशबीन बना हुआ है। क्या प्रशासन उन्हें इतना समय देना चाहता है कि वे हाईकोर्ट से स्टे ले आएं या फिर भ्रष्टाचार के सारे सबूत मिटा दें?
डाइंग डिक्लेरेशन के बाद भी सुस्त क्यों है पुलिस?
मृतक शिक्षक कृष्ण मोहन सिंह ने मरने से पहले अपना आखिरी वीडियो रिकॉर्ड किया और 4 पन्नों का सुसाइड नोट छोड़ा। कानून की भाषा में यह डाइंग डिक्लेरेशन है, जो किसी भी आरोपी को जेल भेजने के लिए सबसे बड़ा साक्ष्य होता है। वीडियो में शिक्षक ने साफ कहा मैडम और बाबू ने मुझे मार डाला। इसके बावजूद पुलिस अब तक केवल ‘बैंक स्टेटमेंट’ और ‘कॉल डिटेल’ के नाम पर वक्त काट रही है। क्या यह गिरफ्तारी टालने की कोई सोची-समझी रणनीति है?
वसूली का ‘ब्लूप्रिंट’: 48 लाख की फिरौती और गहने गिरवी रखने का दर्द
जांच में साफ हुआ है कि यह केवल एक शिक्षक का मामला नहीं था। साथी शिक्षक अपर्णा और ओंकार से भी 16-16 लाख की डिमांड की गई थी। शिक्षक कृष्ण मोहन ने अपनी पत्नी के गहने गिरवी रखे और जमीन बेची, लेकिन बीएसए की रकम की भूख खत्म नहीं हुई। जिस सिस्टम ने एक गुरु को ‘जमीन’ बेचने पर मजबूर कर दिया, उस सिस्टम के रखवाले आज ‘मंत्री जी’ की शरण में दुबक कर बैठे हैं।
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