कल्याण सिंह: सिद्धांत, सादगी और जनविश्वास की विरासत

✍️नवनीत मिश्र

भारतीय राजनीति में कई नेता आए और गए, लेकिन कुछ ही ऐसे हुए जो अपने पद से अधिक अपने व्यक्तित्व के कारण पहचाने गए। कल्याण सिंह उन्हीं में से एक थे। साधारण किसान परिवार से निकलकर वे दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, राज्यपाल पद तक पहुँचे, लेकिन उनकी असली पहचान सत्ता नहीं, बल्कि जनता का विश्वास रही।
कल्याण सिंह का जीवन यह दिखाता है कि राजनीति केवल नीतियों और घोषणाओं का खेल नहीं है, बल्कि जनभावनाओं से सीधा संवाद है। 1991 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने कानून-व्यवस्था और शिक्षा सुधार को प्राथमिकता दी। लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा का सबसे बड़ा मोड़ 6 दिसंबर 1992 को आया, जब अयोध्या में बाबरी ढाँचा ढह गया। इस घटना के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद त्याग दिया। यह त्याग उनके व्यक्तित्व की उस दृढ़ता का प्रतीक है, जहाँ पद से अधिक विचारधारा और विश्वास महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
उनकी छवि कल्याण भइया और बाबू जी की रही। एक ऐसे नेता की, जो सत्ता की ऊँचाई पर पहुँचने के बाद भी जमीनी जुड़ाव नहीं भूले। कार्यकर्ताओं के बीच बैठना, किसानों की समस्या सीधे सुनना और प्रोटोकॉल से ऊपर उठकर जनता तक पहुँचना—यह सब उन्हें विशेष बनाता रहा। राजनीति की चकाचौंध में भी उनकी सादगी और सहजता जनता को आकर्षित करती थी।
राज्यपाल के रूप में भी उन्होंने संविधान की मर्यादाओं का पालन करते हुए निष्पक्ष भूमिका निभाई। यह उनकी प्रशासनिक परिपक्वता और संतुलन की मिसाल थी।
21 अगस्त 2021 को उनके निधन के साथ भारतीय राजनीति ने एक ऐसे नेता को खो दिया, जिसने यह दिखाया कि जनविश्वास ही राजनीति की सबसे बड़ी ताक़त है। कल्याण सिंह का जीवन संदेश देता है कि सत्ता क्षणिक है, लेकिन सिद्धांत और सादगी स्थायी हैं।
“सत्ता आती-जाती है, पर सिद्धांत अमर रहते हैं। जनता का विश्वास ही राजनीति की सबसे बड़ी पूँजी है, और कल्याण सिंह ने यह साबित किया कि नेता सत्ता से नहीं, सादगी से महान बनता है।”

rkpNavneet Mishra

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