बलिया (राष्ट्र की परम्परा)
अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस के अवसर पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जो हर वर्ष 23 सितंबर को मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य श्रवण बाधित समुदायों के लिए सांकेतिक भाषाओं के महत्व को समझाने और उनकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा देने के लिए मनाया जाता है। जब हम चेहरे के हाव-भाव इशारा एवं शरीर के अंगों के माध्यम से अपनी बात कहते हैं, तो यह सांकेतिक भाषा कहलाता है। जैसे कोई सुन नहीं पाता है, तो उसे उंगलियों या हाथ के इशारों के माध्यम से अपनी बात समझाते है। श्रवण दिव्यांग लोगों के लिए सांकेतिक भाषा का काफी महत्व है। यह हिन्दी और अग्रेजी भाषा की तरह सांकेतिक भाषा है। वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ द डेफ ने सांकेतिक भाषाओं की रोकथाम और श्रवण बाधितों की संस्कृति के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस मनाने का संकल्प लिया। इसके अलावा, बधिर लोगों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए भी यह प्रस्ताव अपनाया गया अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस की थीम ष्ैपहद नच वित ैपहद स्ंदहनंहम त्पहीजेष् यानी सांकेतिक भाषा का अधिकार रखा गया है। भारतीय सांकेतिक भाषा दोनों हाथों द्वारा किया जाता है। भारतीय सांकेतिक भाषा अनुसंधान और प्रशिक्षण केंद्र द्वारा भारत में सांकेतिक भाषा बढ़ावा देने के लिए हिन्दी शब्दकोष को सांकेतिक भाषा में अनुवाद किया जा रहा है। है। भारतीय सांकेतिक भाषा अनुसंधान और प्रशिक्षण केंद्र द्वारा राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् के समस्त पाठ्य पुस्तक को अनुवाद किया जा रहा है जिससे श्रवण दिव्यांगजनों को पठन एवं पाठन सुगम हो सकें।
भारत सरकार द्वारा भारतीय सांकेतिक भाषा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र। इसका गठन सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार के दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के तत्वावधान में किया गया था।
इस अवसर पर संस्था द्वारा ए से जेड तक अंग्रेजी में फिंगर स्पेलिंग को लोगों को बताया साथ ही कुछ दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाले शब्दों को सांकेतिक भाषा को बताया गया।
इस अवसर पर सिंधराज, सुनिल कुमार प्रजापति, अवधेश यादव, खुश्बु कुमारी अरविन्द्र, पवन, नितीष मौर्या, प्रिंस आदि एवं डी एड विशेष शिक्षा-श्रवण बाधिता व बौद्धिक अक्षमता के छात्र उपस्थित रहे।
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