नई दिल्ली(राष्ट्र की परम्परा) कभी-कभी खेत में लिया गया एक फैसला पूरी राजनीति की दिशा बदल देता है। इस बार मामला सिर्फ बीज का नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता बनाम विदेशी दबाव की जंग का है। भारत और अमेरिका के बीच महीनों से चल रही ट्रेड बातचीत अचानक ठहर गई है, और वजह बनी है अमेरिकी सोयाबीन।
जानकारी के मुताबिक भारत और अमेरिका के बीच अब तक पाँच दौर की ट्रेड मीटिंग हो चुकी थी। छठा और निर्णायक राउंड अगस्त के अंत में होना तय था। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल 25 अगस्त को भारत आने वाला था, लेकिन अचानक उनका दौरा रद्द कर दिया गया। इससे साफ है कि जिस अंतरिम ट्रेड डील पर सहमति बनने वाली थी, वह अब अधर में लटक गई है।
सोयाबीन पर टकराव
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार विवाद की जड़ अमेरिकी सोयाबीन है। भारत सरकार ने इसे घरेलू बाजार में प्रवेश देने से इंकार कर दिया है। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक है और वहाँ लाखों किसान इसे उगाकर बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सप्लाई करते हैं। इन कंपनियों को लगातार नए बाजारों की तलाश रहती है, ताकि उनके कारोबार को गति मिलती रहे।
भारत का तर्क है कि विदेशी सोयाबीन को मंजूरी देना सीधे-सीधे देशी किसानों और आत्मनिर्भरता अभियान पर चोट होगी। कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर अमेरिकी सोयाबीन की बड़े पैमाने पर एंट्री होती है तो भारतीय किसान कीमतों की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ सकते हैं और घरेलू उत्पादन पर गहरा असर पड़ेगा।
राजनीति और अर्थव्यवस्था पर असर
इस टकराव ने न केवल व्यापारिक रिश्तों में ठंडक ला दी है, बल्कि इसका राजनीतिक संदेश भी बड़ा है। भारत में कृषि सिर्फ खेती नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ा मुद्दा है। ऐसे में सरकार किसी भी कीमत पर किसानों के हितों से समझौता करने के मूड में नहीं दिख रही।
दूसरी ओर, अमेरिका के लिए एशियाई बाजारों में सोयाबीन की खपत बढ़ाना बेहद जरूरी है। चीन के साथ तनाव और यूरोपीय बाजारों में सीमित अवसरों के बीच भारत उनके लिए बड़ा संभावित बाजार माना जा रहा था।
आगे की राह
ट्रेड टॉक का रुकना दोनों देशों के लिए झटका है। हालांकि राजनयिक हलकों में यह उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले महीनों में किसी बीच का रास्ता निकाला जा सकता है। फिलहाल इतना तय है कि खेत से शुरू हुई यह लड़ाई अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति को नई दिशा दे रही है।
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