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जब सत्ता के हाथ में हो सारा पावर, तो निष्पक्ष चुनाव कैसे संभव? — बिहार चुनाव इसका उदाहरण

✍️ चंद्रकांत सी. पूजारी, गुजरात

बिहार में चल रहे विधानसभा चुनाव इस बात का जीवंत उदाहरण हैं कि जब कोई दल सत्ता में होता है, तो उसके पास संसाधनों और शक्ति का इतना केंद्रीकरण हो जाता है कि चुनाव की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। चुनाव प्रचार को देखकर साफ झलकता है कि सत्तारूढ़ पार्टी के पास प्रचार-प्रसार की पूरी पकड़ है, जबकि विपक्ष अपने सीमित साधनों के कारण कमजोर दिखाई देता है।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जनता को सर्वोच्च माना गया है। संविधान ने उसे यह अधिकार दिया है कि वह अपने प्रतिनिधि चुन सके और शासन की दिशा तय कर सके। लेकिन हकीकत इससे अलग है। सत्ता में बैठा दल न केवल प्रशासनिक मशीनरी बल्कि मीडिया, वित्तीय संसाधनों और सरकारी योजनाओं का भी उपयोग अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए करता है।

सत्ता और संसाधनों का केंद्रीकरण लोकतंत्र को कमजोर करता है


सत्ताधारी दल सरकारी विज्ञापनों, विकास योजनाओं और प्रचार अभियानों के जरिए जनता के मनोविज्ञान पर नियंत्रण स्थापित कर लेता है। आम नागरिक, जो रोजमर्रा की परेशानियों में उलझा होता है, वही प्रचार देखकर यह मान बैठता है कि सरकार ही उसके कल्याण की असली वाहक है।

चुनाव के दौरान सत्ता पक्ष अप्रत्यक्ष रूप से सरकारी संसाधनों का उपयोग करता है। दूसरी ओर विपक्ष के पास वह साधन नहीं होते जो सत्ता के पास होते हैं। परिणामस्वरूप जनता के पास वास्तविक विकल्प नहीं बचता और लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ जाती है।

चुनाव प्रभावित करने वाले मुख्य कारक:

  1. प्रशासनिक प्रभाव: सत्ता में रहने वाला दल पुलिस, प्रशासन और सरकारी तंत्र पर नियंत्रण रखता है।
  2. वित्तीय ताकत: सरकारी योजनाओं और विज्ञापनों के माध्यम से सत्ता पक्ष अपनी छवि मजबूत करता है।
  3. मीडिया पर पकड़: मीडिया में सत्ता की उपस्थिति ज्यादा रहती है, जिससे विपक्ष की आवाज़ दब जाती है।
  4. जनता की धारणा: कई मतदाता यह मान लेते हैं कि “सत्ता में वही लौटेंगे”, जिससे विरोध में मतदान का उत्साह कम होता है।

समाधान क्या है?
अगर मतदाता सजग हों और नारे, विज्ञापन या वादों से ऊपर उठकर नीति, नीयत और प्रदर्शन के आधार पर वोट करें, तो लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति पुनः जनता के हाथ में आ सकती है।

चुनाव आयोग को और अधिक स्वतंत्र बनाया जाना चाहिए, सरकारी प्रचार पर आचार संहिता सख्ती से लागू होनी चाहिए, और मीडिया को बिना दबाव के अपनी भूमिका निभाने दी जानी चाहिए।

सत्ताधारी दल के पास भले ही शक्ति और संसाधनों का नियंत्रण हो, पर लोकतंत्र की असली ताकत जनता के पास है। यदि जनता अपने विवेक और जागरूकता के साथ मतदान करे, तो न केवल चुनाव निष्पक्ष होंगे बल्कि लोकतंत्र की जड़ें और भी गहरी होंगी। यही सच्चे लोकतंत्र का सार है।

Karan Pandey

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