हरतालिका तीज : अखंड सौभाग्य और मनचाहे वर की प्राप्ति का व्रत

(राष्ट्र की परम्परा के लिए सुधीर तिवारी उर्फ अंतिम बाबा की रिपोर्ट)

हिंदू धर्म में व्रत और त्योहारों की अपनी विशिष्ट महिमा है। इन्हीं में से एक है हरतालिका तीज, जिसे सुहागिन महिलाओं और कुमारी कन्याओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व माना गया है। इस वर्ष हरतालिका तीज का पर्व 26 अगस्त को मनाया जाएगा। पंडित सुधीर तिवारी उर्फ अंतिम बाबा के अनुसार भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का व्रत किया जाता है।

व्रत की उत्पत्ति और मान्यता मान्यता है कि इस व्रत की शुरुआत स्वयं माता पार्वती ने की थी। भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए माता पार्वती ने भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन कठोर तपस्या और निर्जला व्रत किया था। उनकी इस साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। तभी से यह परंपरा चल पड़ी और इसे अखंड सौभाग्य प्राप्ति का पर्व माना गया।

व्रत की विशेषता हरतालिका तीज का व्रत अत्यंत कठिन माना जाता है। महिलाएं इस दिन निर्जला और निराहार रहकर 24 घंटे से अधिक समय तक उपवास करती हैं। रातभर जागरण कर भक्ति-गीत गाए जाते हैं और अगले दिन प्रातःकाल स्नान कर विधिपूर्वक गौरी-शंकर की पूजा-अर्चना करने के बाद ही व्रत का समापन होता है।
इस व्रत को सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए करती हैं, वहीं कुमारी कन्याएं मनचाहा वर पाने की कामना से उपवास रखती हैं।

धार्मिक महत्व भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र का विशेष योग होने से इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का फल अनेक गुना बढ़ जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत-पूजन करने वाली महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि इस व्रत को “सौभाग्य का महापर्व” कहा जाता है।

देशभर में उत्सव हरतालिका तीज मुख्य रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में धूमधाम से मनाई जाती है। दक्षिण भारत के राज्यों—कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में इसे “गौरी हब्बा” के नाम से जाना जाता है। हरियाली तीज और कजरी तीज के बाद यह तीसरा बड़ा तीज पर्व है, जिसकी अपनी विशेष धार्मिक महत्ता है।

पूजन विधि इस दिन महिलाएं सुबह स्नान कर नए वस्त्र धारण करती हैं और श्रृंगार कर देवी पार्वती का स्मरण करती हैं। व्रत के दौरान महिलाएं मिट्टी या बालू से भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की मूर्तियां बनाकर पूजन करती हैं। पूजा के समय सोलह श्रृंगार का विशेष महत्व होता है। महिलाएं मंगल गीत गाती हैं और सामूहिक रूप से व्रत कथा का श्रवण करती हैं।
हरतालिका तीज केवल एक व्रत ही नहीं बल्कि आस्था, विश्वास और प्रेम का प्रतीक है। यह पर्व स्त्री की तपस्या, त्याग और समर्पण की परंपरा को दर्शाता है। माना जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से दांपत्य जीवन में सौहार्द, सुख और समृद्धि बनी रहती है। सुहागिन महिलाओं को जहां अपने पति की लंबी आयु का वरदान मिलता है, वहीं कुमारी कन्याओं को योग्य वर की प्राप्ति होती है। इसीलिए हरतालिका तीज को हिंदू धर्म में अखंड सौभाग्य का व्रत कहा गया है।


Editor CP pandey

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