✍️ पुनीत मिश्र
भारत के इतिहास में साहस, सहिष्णुता और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने वाले नामों में गुरु तेग बहादुर का स्थान अनन्य है। वे केवल सिख परंपरा के नौवें गुरु ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के संरक्षक, सत्य के प्रहरी और अत्याचार के अप्रतिम प्रतिरोध का प्रतीक थे। उनके जीवन की प्रत्येक घटना हमें यह बताती है कि धर्म का अर्थ संकुचित पहचान नहीं, बल्कि हर पीड़ित के अधिकार की रक्षा हैl चाहे वह किसी भी संप्रदाय, जाति या वर्ग से हो।
1621 में अमृतसर में जन्मे तेग बहादुर ने बचपन से ही वीरता और आध्यात्मिक शुचिता दोनों को आत्मसात किया। पिता गुरु हरगोबिंद की सैन्य परंपरा और आध्यात्मिक अनुशासन इन दोनों ने मिलकर उनके व्यक्तित्व को आकार दिया। युवावस्था में वे युद्ध कौशल में सिद्धहस्त थे, परंतु बाद में उनका मन तप, ध्यान और आत्मविचार की ओर अधिक आकर्षित हुआ। इसी गंभीरता और शांत तेजस्विता के कारण वे ‘तेग बहादुर’ कहलाएl वह वीर जिसने तलवार को संयम का प्रतीक बनाया, आक्रमण का नहीं।
गुरु पद ग्रहण करने के बाद उनका उद्देश्य केवल आध्यात्मिक उपदेश देना नहीं था; उन्होंने समाज में न्याय, समानता और धर्मस्वातंत्र्य की अनिवार्यता को स्थापित किया। वे मानते थे कि सच्ची भक्ति तब ही सार्थक है जब व्यक्ति निर्बल की रक्षा के लिए प्रतिरोध का साहस रखता हो। गुरु तेग बहादुर के प्रवचनों में यह भावना बार-बार प्रकट होती है कि मनुष्य को अपने भीतर के भय को जीतकर सत्य के लिए खड़ा होना चाहिएl चाहे उसके लिए प्राण ही क्यों न देने पड़ें।
जब कश्मीरी पंडितों पर जबरन धर्मांतरण का संकट आया, तब उन्होंने किसी राजा या हथियारबंद सेना के पास न जाकर गुरु तेग बहादुर से मदद मांगी। यह एक असाधारण विश्वास थाl क्योंकि वे सिख नहीं थे, फिर भी उन्हें लगा कि उनके अधिकारों के रक्षक गुरु तेग बहादुर ही हैं। गुरुजी ने बिना किसी संकोच के कहा “जो तुम्हारी रक्षा कर सकता है, वह दिल्ली की गद्दी तक जाकर करेगा।” यह कथन केवल एक आश्वासन नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक सत्य का प्रारंभ था जिसमें एक गुरु ने किसी अन्य धर्म के लोगों की आस्था बचाने के लिए स्वयं का बलिदान चुन लिया।
औरंगज़ेब के दरबार में उनसे केवल इतना कहा गया कि धर्म छोड़ दो, प्राण बच जाएंगे। पर गुरु तेग बहादुर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सत्य और धर्म यदि सौदे में लगाए जाएँ तो गुरुता का कोई अर्थ नहीं। उनके तीन शिष्यों की भयावह यातनाओं के बाद भी उनका धैर्य नहीं टूटा। अंततः 1675 में कुठाराघात से उनका बलिदान हुआ। इस बलिदान को इतिहास में हिन्द की चादर का नाम इसलिए मिला क्योंकि उन्होंने धर्म की स्वतंत्रता पर छाए भय के अंधकार को अपने आत्म-समर्पण से ढक लिया। यह विश्व इतिहास का वह दुर्लभ क्षण है जब किसी गुरु ने अपने अनुयायियों के लिए नहीं, बल्कि किसी और समुदाय की रक्षा हेतु मृत्यु को चुना।
गुरु तेग बहादुर की वाणी, जो गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज है, आज भी मन को मुक्त करने वाली है। उनका उपदेश है कि मनुष्य का सच्चा बल बाहरी शक्ति में नहीं, बल्कि दृढ़ और शांत अंत:करण में होता है। उनका दर्शन किसी संप्रदाय की सीमा में नहीं बंधा, बल्कि सर्वजन हिताय की नींव पर आधारित है। वे हमें सिखाते हैं कि भय से ऊपर उठकर सत्य का पालन ही वास्तविक आध्यात्मिकता है।
आज जब विश्व धार्मिक असहिष्णुता और पहचान की राजनीति से जूझ रहा है, गुरु तेग बहादुर का संदेश और भी प्रासंगिक हो उठा है। उनकी जीवनगाथा हमें बताती है कि धर्म का सार किसी एक विचारधारा का प्रभुत्व नहीं, बल्कि दूसरे के अधिकार की रक्षा है। शांति कोई कमजोरी नहींl बल्कि वह शक्ति है जो अत्याचार की नींव हिला सकती है। न्याय, करुणा और अधिकारों की रक्षा के लिए गुरुजी का साहस आज भी हर पीढ़ी को प्रेरित करता है।
गुरु तेग बहादुर का बलिदान केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं; वह भारतीय सभ्यता की आत्मा में अंकित शाश्वत प्रेरणा है। वे हमें यह राह दिखाते हैं कि सत्य, न्याय और स्वतंत्रता के लिए खड़ा होना ही मनुष्य होने का वास्तविक अर्थ है। उनकी विरासत हमें याद दिलाती है कि पहचानें अलग हो सकती हैं, पर मानवता एक ही हैl और उसी मानवता की रक्षा के लिए हिन्द की चादर ने हंसते-हंसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
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