कोशिश करने वाले की हार नहीं होती को चरितार्थ करती व्हीलचेयर से अंतरराष्ट्रीय मंच तक, ज्योति सिंहा बनीं पर्पल एंबेसडर
मुजफ्फरपुर (राष्ट्र की परम्परा)मुजफ्फरपुर की संकरी गलियों से उठी एक आवाज़ ने दुनिया को दिखा दिया कि शरीर की सीमाएं आत्मा की उड़ान को रोक नहीं सकतीं। मस्कुलर डिस्ट्रोफी जैसी लाइलाज बीमारी से जूझते हुए भी शिक्षा और कला में अपनी पहचान बनाने वाली ज्योति सिंहा अब भारत की ‘पर्पल एंबेसडर 2025’ बनकर गोवा में अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा लहराने जा रही हैं।
दिव्यांगजन अधिकारिता विभाग ने ज्योति को देश की 21 पर्पल एंबेसडर्स में शामिल किया है। वे 9 से 21 अक्टूबर 2025 के बीच गोवा में होने वाले अंतरराष्ट्रीय पर्पल फेस्ट में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी—एक ऐसा उत्सव जो विविधता, सशक्तिकरण और समावेशिता का प्रतीक है।
ज्योति भावुक होकर कहती हैं—
“मेरे माता-पिता, गुरुजन और भाई—यही मेरी असली ताकत हैं। यह सम्मान मैं अपने पूरे गांव और समाज को समर्पित करती हूं।”2002 में बचपन में ही मस्कुलर डिस्ट्रोफी का पता चला। धीरे-धीरे कमर से नीचे का हिस्सा निष्क्रिय हो गया, पर उन्होंने कभी हार नहीं मानी। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद मैट्रिक, इंटर, स्नातक और एमए प्रथम श्रेणी से पास किया और आज हिंदी में पीएचडी कर रही हैं—वो भी व्हीलचेयर पर बैठकर, मगर सिर ऊंचा रखकर।
2014 में मिथिला पेंटिंग पर आधारित एक किताब ने उनकी जिंदगी बदल दी। गुरु कृष्ण कुमार कश्यप से मार्गदर्शन लेकर मधुबनी पेंटिंग में महारत हासिल की और राज्य-राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाया। उनकी कलाकृतियां सिर्फ रंगों का मेल नहीं, बल्कि संघर्ष और उम्मीद की जीवंत कहानियां हैं।
ज्योति ने अपनी कला का उपयोग दूसरों के लिए किया—गांव के 25-30 गरीब बच्चों को मुफ्त में मधुबनी पेंटिंग सिखाकर उन्हें हुनरमंद बनाने का मिशन शुरू किया।
“जब आप खुद दर्द से गुजरते हैं, तो दूसरों का दर्द भी बेहतर समझते हैं,” वे कहती हैं।
आज ज्योति सिंहा सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि लाखों के लिए प्रेरणा हैं—साबित करते हुए कि मजबूत इरादे के आगे कोई भी शारीरिक कमजोरी मायने नहीं रखती।
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