दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के इस वर्ष के प्रवेश परीक्षा परिणामों ने फिर एक बार साबित कर दिया कि अब शिक्षा में लड़कियां पीछे नहीं, बल्कि सबसे आगे हैं। 13 स्नातक और 22 परास्नातक पाठ्यक्रमों की टॉपर्स लिस्ट में बेटियों का नाम चमकना सिर्फ परीक्षा में बेहतर अंक लाने की बात नहीं है, यह उस सामाजिक बदलाव की तस्वीर है जिसमें बेटियां अब सपने देखने ही नहीं, उन्हें हासिल करने का साहस भी रखती हैं।
गांव-कस्बों से लेकर शहरी गलियों तक, लड़कियां न केवल पारंपरिक पाठ्यक्रमों बल्कि बीटेक, बीसीए, फार्मेसी, लॉ और डेटा साइंस जैसे तकनीकी और व्यावसायिक क्षेत्रों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आया है—यह उन वर्षों की मेहनत, जागरूकता और सामाजिक समर्थन का परिणाम है जो अब शिक्षा के नक्शे पर नज़र आ रहा है।
गोरखपुर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. पूनम टंडन का यह कथन कि “बेटियों की सफलता समाज के सकारात्मक रुझान का प्रमाण है” बिलकुल सटीक है। विश्वविद्यालय का समयबद्ध और पारदर्शी प्रवेश प्रक्रिया संचालन भी इस बदलाव में एक सशक्त मंच बनकर उभरा है।
सवाल सिर्फ टॉप करने का नहीं है— यह बदलाव शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण में आए उस परिर्वतन का परिचायक है जो आने वाले वर्षों में पूरे पूर्वांचल और देश की तस्वीर बदल सकता है।
आज ये छात्राएं टॉपर बनी हैं, कल ये समाज की नेतृत्वकर्ता होंगी।
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