किसान अधिकार और बीज गुणवत्ता: नया नियामक ढांचा

नकली बीजों पर लगाम: बीज विधेयक 2025 से किसान संरक्षण, गुणवत्ता नियमन और वैश्विक कृषि शासन की ओर भारत का निर्णायक कदम

गोंदिया | विशेष लेख


वर्तमान डिजिटल और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के युग में विश्व अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ-साथ नकली और निम्न गुणवत्ता वाले उत्पादों का प्रसार एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय चुनौती बन चुका है। दवाइयों, खाद्य पदार्थों, तकनीकी उपकरणों के साथ-साथ कृषि आदानों—विशेषकर नकली बीजों—का संकट किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए बहुआयामी नुकसान का कारण बन रहा है। यह नुकसान केवल आर्थिक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन, आजीविका और दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा तक फैलता है।

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मैं, एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी (गोंदिया, महाराष्ट्र), यह मानता हूं कि कृषि क्षेत्र में नकली बीजों का प्रभाव सबसे अधिक घातक है, क्योंकि यहां नुकसान एक किसान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय कृषि प्रणाली और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला तक पहुंचता है। नकली या घटिया बीज पूरी फसल को नष्ट कर सकते हैं, जिससे किसान की आय, ऋण चुकाने की क्षमता और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। इसी पृष्ठभूमि में बीज विधेयक 2025 भारत सरकार का एक निर्णायक और समयोचित विधायी कदम है।

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बीज विधेयक 2025: पुराने कानून का आधुनिक विकल्प
बीज विधेयक 2025 वर्ष 1966 के पुराने बीज अधिनियम का स्थान लेने के लिए लाया गया है, जो आज के जटिल, निजी-निवेश आधारित और वैश्विकीकृत बीज बाजार के अनुरूप अपर्याप्त सिद्ध हो रहा था। पिछले दशकों में निजी कंपनियों, हाइब्रिड किस्मों, उन्नत तकनीकों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के विस्तार के बावजूद नियामक ढांचा पीछे रह गया। इसी अंतर का लाभ उठाकर नकली बीज कारोबार पनपा। नया विधेयक इस असंतुलन को दूर कर कृषि बाजार में पारदर्शिता, जवाबदेही और गुणवत्ता संस्कृति स्थापित करता है।

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अनिवार्य पंजीकरण और गुणवत्ता मानक
विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि बाजार में बिकने वाली सभी बीज किस्मों का अनिवार्य पंजीकरण होगा—चाहे वे सार्वजनिक संस्थानों द्वारा विकसित हों या निजी कंपनियों द्वारा। बिना नियामक स्वीकृति कोई बीज किसानों तक नहीं पहुंचेगा। इसके साथ-साथ बीज उत्पादकों, प्रसंस्करण इकाइयों, डीलरों और नर्सरियों का पंजीकरण भी अनिवार्य होगा, जिससे पूरी आपूर्ति श्रृंखला निगरानी में रहेगी। अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताता है कि ऐसी ट्रैकिंग व्यवस्था नकली उत्पादों पर सबसे प्रभावी रोक है—और बीज विधेयक 2025 भारत को वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के समकक्ष खड़ा करता है।

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कीमत नियंत्रण, लेबलिंग और ‘साथी पोर्टल’
आपातकालीन परिस्थितियों—प्राकृतिक आपदा, जलवायु संकट या महामारी—में बीजों की कृत्रिम कमी और कीमतों में उछाल आम समस्या रही है। बीज विधेयक 2025 सरकार को कीमतें नियंत्रित करने का अधिकार देता है, जिससे किसानों का शोषण रोका जा सके।
इसके अतिरिक्त, अनिवार्य लेबलिंग के तहत बीज की किस्म, अंकुरण क्षमता, शुद्धता, उत्पादन वर्ष जैसी जानकारियां स्पष्ट रूप से देना आवश्यक होगा। इससे किसान सूचित निर्णय ले सकेंगे और धोखाधड़ी घटेगी।
डिजिटल युग को ध्यान में रखते हुए ‘साथी पोर्टल’ पर पंजीकरण अनिवार्य किया गया है, जो उत्पादकों, डीलरों और नियामक एजेंसियों के बीच एक साझा मंच बनेगा—निगरानी, शिकायत निवारण और डेटा-आधारित नीति-निर्माण को गति देगा।

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किसान अधिकारों की पूर्ण सुरक्षा
एक प्रमुख आशंका यह थी कि कहीं यह कानून किसानों की पारंपरिक प्रथाओं को सीमित न कर दे। विधेयक इस विषय में स्पष्ट है—किसानों और उनकी पारंपरिक किस्मों पर ये प्रावधान लागू नहीं होते। यह कानून पादप किस्मों के संरक्षण एवं किसान अधिकार अधिनियम, 2001 और जैविक विविधता अधिनियम, 2002 के अनुरूप किसानों के अधिकारों—बीज उगाने, सहेजने, आदान-प्रदान और बेचने—की रक्षा करता है। यह संतुलन इस विधेयक की बड़ी ताकत है।

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कठोर दंड और वैश्विक भरोसा– नकली बीजों की बिक्री पर 20 लाख रुपये तक का जुर्माना और कारावास का प्रावधान एक मजबूत निवारक संदेश देता है कि कृषि क्षेत्र में धोखाधड़ी अब बर्दाश्त नहीं होगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कृषि इनपुट्स की गुणवत्ता को लेकर जो सख्ती अपनाई जा रही है, बीज विधेयक 2025 उसी दिशा में भारत का सशक्त कदम है।

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वैश्विक परिप्रेक्ष्य और निष्कर्ष
आज जब खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और सतत विकास वैश्विक एजेंडा हैं, तब बीजों की गुणवत्ता निर्णायक भूमिका निभाती है। बीज विधेयक 2025 न केवल घरेलू किसानों के हितों की रक्षा करता है, बल्कि भारत की कृषि आपूर्ति श्रृंखला को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भरोसा बढ़ाता है।

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अतः स्पष्ट है कि बीज विधेयक 2025 नकली माल के खिलाफ भारत की व्यापक नीति का कृषि क्षेत्र में ठोस प्रतिबिंब है। यह कानून किसानों को ठगी से बचाने, बाजार में अनुशासन लाने और दीर्घकालिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था व खाद्य सुरक्षा को स्थिरता देने की क्षमता रखता है। इसे केवल कानून नहीं, बल्कि भारत की कृषि नीति में संरचनात्मक सुधार के रूप में देखा जाना चाहिए।


संकलनकर्ता/लेखक: एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया (महाराष्ट्र)

Editor CP pandey

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