बहाना यूजीसी, इरादा मनु की प्रेतसिद्धि

लेखक— बादल सरोज


बीते कुछ दिनों से एक संगठित कुनबा पूरी तेजी के साथ समाज में उबाल पैदा करने की कोशिश में लगा है। वही पुराना तरीका अपनाया जा रहा है—अधूरी जानकारी में तड़का, अफवाहों का प्रसार और व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय से उपजा अज्ञान। जाति-श्रेष्ठता के वायरस को संक्रामक बनाकर पहले से ही कमजोर समाज को और बीमार किया जा रहा है। मकसद भी वही पुराना है: सामाजिक न्याय के किसी भी आधे-अधूरे प्रयास को “हिंदू समाज के लिए खतरा” बताना और सदियों पुराने वर्चस्वकारी, अमानवीय जातिगत उत्पीड़न को “शास्त्रसम्मत परंपरा” घोषित करना।
इस बार बहाना बना है यूजीसी के नए नियम। कुछ कथित बुद्धिजीवी इन्हें सवर्ण समुदाय के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बताकर उन्माद फैला रहे हैं, और संयोग से जाति विशेष में जन्मे कुछ भोले लोग इस शोरगुल के पीछे छिपी चाल को समझे बिना उसी जाल में उलझते जा रहे हैं।

ये भी पढ़ें – भव सगरा पोखरा: पांडवों की तपोभूमि से जुड़ी लोकआस्थाएं

नफरती भाषणों के लिए कुख्यात चेहरे, जो कभी गांधी से लेकर एपीजे अब्दुल कलाम तक पर अपशब्दों की बौछार कर चुके हैं, आज यूजीसी के नियमों को “डेथ वारंट” कह रहे हैं। कुछ कवि, अफसर और छुटभैये नेता अपने-अपने मंचों से इस आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। इस्तीफों की घोषणाएँ, उग्र पोस्टर और तुलना रोलेट एक्ट से—यह सब उसी प्रायोजित व्यथा का हिस्सा है।
इस शोर को समझने के लिए जरूरी है कि पहले यह जाना जाए कि ये नियम वास्तव में हैं क्या, क्यों लाए गए और किस प्रक्रिया से बने।
क्या हैं यूजीसी के नए नियम?
13 जनवरी 2026 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने नियमावली के नियम 3(सी) में संशोधन करते हुए “उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता के संवर्धन संबंधी नियम, 2026” अधिसूचित किए, जो 15 जनवरी से लागू हैं। यह कोई पहली पहल नहीं है। वर्ष 2012 में भी ऐसे नियम बने थे, लेकिन उनकी लगभग पूरी तरह विफलता के कारण इन्हें प्रभावी बनाने के लिए नए प्रावधान जोड़े गए।
इन नियमों के तहत प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान में इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर, संस्थान प्रमुख की अध्यक्षता में इक्विटी कमेटी, साल में दो बार सार्वजनिक रिपोर्ट, 24×7 हेल्पलाइन, छात्रावासों और विभागों में इक्विटी स्क्वाड, त्वरित शिकायत निस्तारण और एक स्वतंत्र ओम्बुड्समैन की व्यवस्था अनिवार्य की गई है। साथ ही जाति, धर्म, लिंग, विकलांगता और जन्मस्थान के आधार पर होने वाले भेदभाव को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है।

ये भी पढ़ें – अखंड ज्योति का संदेश: आत्मिक प्रकाश से सामाजिक परिवर्तन तक

क्यों लाने पड़े ये नियम?
ये नियम किसी सरकार की सदाशयता का परिणाम नहीं हैं, बल्कि दलित, आदिवासी और वंचित समुदायों के छात्रों के खिलाफ बढ़ते जातिगत उत्पीड़न और आत्महत्याओं की भयावह श्रृंखला की पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का नतीजा हैं।
रोहित वेमुला, पायल तड़वी, दर्शन सोलंकी और आईआईटी व अन्य संस्थानों के कई छात्रों की आत्महत्याएँ इस अमानवीय व्यवस्था का कड़वा सच हैं। यूजीसी ने स्वयं सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया कि पिछले पांच वर्षों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 118 प्रतिशत से अधिक वृद्धि हुई है, जबकि लंबित मामलों में यह आंकड़ा 500 प्रतिशत तक पहुँचा है।
कैसे बने ये नियम?
सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में स्पष्ट निर्देश दिया कि 2012 के नियमों की विफलता को देखते हुए एक प्रभावी ढाँचागत व्यवस्था बनाई जाए। इसके बाद यूजीसी ने मसौदा जारी कर सार्वजनिक सुझाव लिए, संसदीय स्थायी समिति ने समीक्षा की और अंततः 13 जनवरी 2026 को इन्हें लागू किया गया।

ये भी पढ़ें – मगहर महोत्सव 2026 में गूंजेगी 1857 की क्रांति की दास्तान

साफ़ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं
85 प्रतिशत से अधिक आबादी से जुड़े छात्रों के लिए बनाए गए इन न्यूनतम सुरक्षा उपायों पर इतना कोहराम इस बात का प्रमाण है कि असल डर समानता से है। यह वर्णाश्रम की उस मानसिकता का आर्तनाद है, जो किसी भी सुधार को अपने प्रभुत्व पर खतरा मानती है। खुलकर जाति-श्रेष्ठता का समर्थन नहीं कर पाने के कारण, झूठी अफवाहों के सहारे सवर्ण एकता का भ्रम रचा जा रहा है।
यही है ‘हिंदू राष्ट्र’ का असली चेहरा
जिसे पहले धर्म कहा गया, फिर सनातन और अब खुले तौर पर वर्णाधारित ब्राह्मणवादी व्यवस्था के रूप में स्थापित करने की कोशिश हो रही है। यह वही सोच है जिसने हर सामाजिक सुधार का विरोध किया और आज तक अपने ऐतिहासिक अन्यायों के लिए माफी नहीं मांगी।

ये भी पढ़ें – यूजीसी समानता विनियम 2026: सामाजिक न्याय बनाम संवैधानिक संतुलन पर गंभीर बहस

खेल की असलियत और जनता की भूमिका
जो लोग रोजगार, शिक्षा और सार्वजनिक संसाधनों के विनाश पर चुप रहे, वे आज समानता के नियमों को “डेथ वारंट” बता रहे हैं। सवाल यह है कि भारत किस दिशा में जाएगा—संविधान की राह पर या मनुस्मृति की परछाईं में। तटस्थ रहना अब विकल्प नहीं है, क्योंकि जैसा कहा गया है, तटस्थता भी अपराध बन जाती है।

Editor CP pandey

Recent Posts

वाको इंडिया इंटरनेशनल किकबॉक्सिंग कप में तिरंगा लहराने उतरेंगे डीडीयू के सनी सिंह

गोरखपुर(राष्ट्र की परम्परा)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के एम.ए. समाजशास्त्र द्वितीय सेमेस्टर के छात्र और…

37 minutes ago

मगहर महोत्सव में “गंगा अवतरण” नृत्य-नाटिका ने बांधा समां

संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। मगहर महोत्सव में शनिवार रात नव अंशिका फाउंडेशन द्वारा…

40 minutes ago

जिले में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई गई संत रविदास जयंती

संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। जनपद में संत रविदास जयंती का पर्व पूरे उत्साह…

43 minutes ago

पाकिस्तान की बड़ी जीत, उस्मान तारिक के एक्शन पर उठा विवाद

खेल (राष्ट्र की परम्परा)। टी20 वर्ल्ड कप 2026 से पहले खेली जा रही अहम टी20…

1 hour ago

कृषि बजट 2026: किसानों की आय बढ़ाने पर सरकार का फोकस

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कृषि बजट 2026 में किसानों की आमदनी बढ़ाने और…

2 hours ago

बजट 2026: रेल से स्वास्थ्य तक बड़े ऐलान, विपक्ष का तीखा विरोध

बजट 2026: इंफ्रास्ट्रक्चर, रेल, स्वास्थ्य और महिलाओं पर फोकस—पक्ष-विपक्ष आमने-सामने नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा…

2 hours ago