जब पढ़ा खड़ा हो और अनपढ़ बैठा हो: लोकतंत्र में शिक्षा का अपमान
डॉ. सत्यवान सौरभ
किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी शिक्षा-व्यवस्था और उस शिक्षा को मिलने वाले सम्मान से होती है। शिक्षा केवल डिग्रियों का संग्रह नहीं, बल्कि विवेक, अनुशासन, संवैधानिक समझ और सार्वजनिक जिम्मेदारी का संस्कार है। प्रश्न यह है कि क्या भारत जैसा लोकतांत्रिक राष्ट्र वास्तव में इस शिक्षा का सम्मान कर रहा है, या फिर सत्ता के गलियारों में पढ़े-लिखे लोग केवल आदेश पालन की मुद्रा में खड़े रहने के लिए ही नियत कर दिए गए हैं।
भारत में लाखों युवा वर्षों तक कठिन तैयारी, असफलताओं और निरंतर संघर्ष के बाद सिविल सेवाओं तक पहुँचते हैं। वे संविधान, प्रशासन, अर्थव्यवस्था, समाजशास्त्र और नीति-निर्माण जैसे विषयों का गहन अध्ययन कर आईएएस, आईपीएस और अन्य सेवाओं में चयनित होते हैं। चयन के बाद भी प्रशिक्षण, फील्ड पोस्टिंग और जवाबदेही का कठोर अनुशासन उनका हिस्सा रहता है। इसके बावजूद अनेक अवसरों पर वही अधिकारी ऐसे जनप्रतिनिधियों के सामने हाथ बाँधकर खड़े दिखते हैं, जिनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि और प्रशासनिक समझ सीमित होती है। यही वह दृश्य है जहाँ व्यंग्य नहीं, व्यवस्था की कड़वी सच्चाई बोलती है—अनपढ़ बैठे हैं, पढ़ा खड़ा है।
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एक सिविल सेवक बनने की यात्रा वर्षों की साधना है। यह परीक्षा केवल स्मरण-शक्ति की नहीं, बल्कि विश्लेषण, नैतिकता और दबाव में सही निर्णय लेने की क्षमता की भी कसौटी है। सेवा में आने के बाद हर फाइल, हर आदेश और हर हस्ताक्षर भविष्य की जांच-परख के दायरे में रहता है। इसके विपरीत, राजनीति में प्रवेश के लिए न न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य है, न ही प्रशासनिक प्रशिक्षण। जनसमर्थन लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन जब वही जनसमर्थन योग्यता के अभाव को ढकने का साधन बन जाए, तो समस्या गहराने लगती है।
लोकतंत्र का अर्थ जनता का शासन है, लेकिन लोकतंत्र कभी भी अज्ञान का उत्सव नहीं रहा। दुनिया की सफल लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में राजनीतिक नेतृत्व और पेशेवर प्रशासन—दोनों को समान महत्व दिया गया है। वहाँ निर्णय भावनाओं से नहीं, तथ्यों और तर्कों से लिए जाते हैं। भारत में स्थिति यह बनती जा रही है कि बहस में शोर अधिक है और अध्ययन कम। आरोप-प्रत्यारोप की गर्मी अधिक है, जबकि आंकड़ों और तथ्यों की रोशनी कम। ऐसे माहौल में अफसरशाही, जो ज्ञान और प्रक्रिया की प्रतिनिधि है, केवल आदेश मानने वाली मशीन बनकर रह जाती है।
स्वतंत्र भारत की कल्पना में खादी और खाकी को एक-दूसरे का पूरक माना गया था। खादी जनमत और नीति-निर्माण का प्रतीक थी, खाकी कानून और निष्पक्ष क्रियान्वयन का। दोनों के बीच सम्मान आधारित संतुलन से ही सुशासन की नींव रखी जानी थी। आज स्थिति यह है कि खादी कई बार संख्या-बल और सत्ता की ताकत के सहारे अपनी बात थोपती दिखती है, जबकि खाकी स्थानांतरण, प्रतिशोध या आरोपों के डर से विवेकपूर्ण सलाह देने से कतराने लगती है। परिणामस्वरूप “सही क्या है” से अधिक महत्वपूर्ण “ऊपर क्या चाहते हैं” हो जाता है।
इस मानसिकता का सीधा असर समाज में शिक्षा की छवि पर पड़ता है। जब युवा देखते हैं कि जिसने वर्षों पढ़ाई की, वही अंततः केवल खड़ा है, और बिना तैयारी के सत्ता तक पहुँचा व्यक्ति बैठकर निर्णय ले रहा है, तो शिक्षा के प्रति निराशा स्वाभाविक है। संदेश स्पष्ट हो जाता है—ज्ञान से सत्ता नहीं मिलती, मेहनत से सम्मान सुनिश्चित नहीं। धीरे-धीरे शिक्षा केवल नौकरी पाने का माध्यम बन जाती है, समाज को दिशा देने का नहीं।
विडंबना यह भी है कि जब नीतियाँ विफल होती हैं या योजनाएँ जमीन पर नहीं उतरतीं, तो सबसे पहले जिम्मेदारी अफसरों पर डाल दी जाती है। जबकि वास्तविकता यह है कि बड़े निर्णय राजनीतिक स्तर पर लिए जाते हैं और अफसर उनका क्रियान्वयन करते हैं। यह दोहरा अन्याय है—निर्णय में सीमित भूमिका, लेकिन जवाबदेही पूरी।
यह प्रश्न उठाना आवश्यक है कि क्या नीति-निर्माण के लिए न्यूनतम शिक्षा और प्रशासनिक समझ जरूरी नहीं होनी चाहिए। यह जनप्रतिनिधियों की वैधता पर सवाल नहीं, बल्कि शासन की क्षमता पर चर्चा है। जनादेश सर्वोच्च है, लेकिन क्या जनादेश अपने-आप में हर क्षेत्र की विशेषज्ञता का प्रमाणपत्र है? जब डॉक्टर, इंजीनियर और शिक्षक के लिए योग्यता अनिवार्य है, तो करोड़ों लोगों को प्रभावित करने वाले मंत्रालयों के नेतृत्व के लिए क्यों नहीं?
समाधान किसी एक पक्ष को श्रेष्ठ या हीन ठहराने में नहीं है, बल्कि संतुलन में है। जनप्रतिनिधि नीति की दिशा तय करें, प्राथमिकताएँ निर्धारित करें और अफसर उस दिशा को संवैधानिक ढांचे व प्रशासनिक व्यावहारिकता के अनुसार लागू करें। इसके लिए जनप्रतिनिधियों के लिए अनिवार्य संवैधानिक प्रशिक्षण, मंत्रियों और विधायकों के लिए व्यवस्थित ओरिएंटेशन, विशेषज्ञों की सक्रिय भागीदारी और अफसरशाही को भय-मुक्त पेशेवर स्वतंत्रता आवश्यक है।
लोकतंत्र में शिक्षा का सम्मान मांगना लोकतंत्र-विरोधी नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करने का प्रयास है। जनता चाहती है कि निर्णय सोच-समझकर, तथ्यों और तर्कों के आधार पर हों। जब तक यह दृश्य बना रहेगा—खादी बैठी है, खाकी खड़ी है—तब तक शिक्षा का अपमान होता रहेगा। जिस दिन पढ़ा-लिखा केवल खड़ा नहीं, बल्कि सम्मान के साथ निर्णय करता दिखाई देगा, उसी दिन कहा जा सकेगा कि भारत में शिक्षा को उसका वास्तविक स्थान मिला है।
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