गोरखपुर ने खोया चिकित्सा जगत का अनमोल रत्न! 90 साल की उम्र में डॉ. राम रतन बनर्जी का निधन
यश भारती सम्मान से सम्मानित होम्योपैथिक चिकित्सक के निधन से पूर्वांचल में शोक, गरीबों के इलाज से लेकर भोजपुरी में स्वास्थ्य जागरूकता तक छोड़ी अमिट छाप
✍️ गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। पूर्वांचल के चिकित्सा जगत से एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। होम्योपैथी चिकित्सा के प्रतिष्ठित नाम, यश भारती सम्मान से अलंकृत डॉ. राम रतन बनर्जी अब हमारे बीच नहीं रहे। 90 वर्ष की आयु में उनके निधन से गोरखपुर ने अपना एक ऐसा अनमोल रत्न खो दिया, जिसकी पहचान केवल एक अनुभवी चिकित्सक के रूप में नहीं, बल्कि जनसेवा, सामाजिक सरोकार और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से भी जुड़ी रही। करीब सात दशकों तक चिकित्सा के क्षेत्र में सक्रिय रहे डॉ. बनर्जी ने अपने लंबे सफर में हजारों लोगों के जीवन को छुआ और स्वास्थ्य जागरूकता को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया। उनके निधन को चिकित्सा जगत के साथ शहर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के लिए भी बड़ी क्षति माना जा रहा है। डॉ. राम रतन बनर्जी का जीवन इस बात की मिसाल रहा कि चिकित्सक की जिम्मेदारी सिर्फ मरीज का इलाज करने तक सीमित नहीं होती। जरूरतमंदों की सहायता, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, स्वास्थ्य संबंधी भ्रांतियों को दूर करने और समाज को जागरूक बनाने के लिए उन्होंने लगातार काम किया। अनुशासन, समय की पाबंदी और मरीजों के प्रति संवेदनशील व्यवहार उनकी विशिष्ट पहचान रही। गोरखपुर में जन्म, कोलकाता से शिक्षा और न्यूयॉर्क तक पहुंचा सफर डॉ. बनर्जी का जन्म 3 जून 1936 को गोरखपुर में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा राजकीय जुबिली इंटर कॉलेज में हुई। वर्ष 1952 में सेंट एंड्रयूज कॉलेज से इंटरमीडिएट और 1954 में विज्ञान स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने होम्योपैथी को अपना जीवन समर्पित करने का निर्णय लिया। वर्ष 1959 में कलकत्ता होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल से उन्होंने स्वर्ण पदक के साथ चिकित्सा शिक्षा पूरी की। अपनी शैक्षणिक यात्रा को आगे बढ़ाते हुए वर्ष 1975 में न्यूयॉर्क स्थित द होमियो इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिन से होम्योपैथिक साइंस में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। उनकी यह यात्रा स्थानीय स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक मंच तक उनकी सक्रियता और चिकित्सा के प्रति समर्पण को दर्शाती है। 1959 से शुरू हुई सेवा की यात्रा, जरूरतमंदों को दिया सहारा डॉ. राम रतन बनर्जी ने वर्ष 1959 में होम्योपैथिक चिकित्सा सेवा शुरू की। गोरखपुर के बेनीगंज-रानीगोला स्थित संतोष होमियो सेवाश्रम उनकी चिकित्सा गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना। यहां से उन्होंने मरीजों के उपचार के साथ समाज के कमजोर और जरूरतमंद वर्गों की मदद को भी प्राथमिकता दी। निःशुल्क चिकित्सा शिविरों और औषधि वितरण कार्यक्रमों के जरिए जरूरतमंदों तक सहायता पहुंचाने का प्रयास किया। रामकृष्ण समिति सहित विभिन्न दातव्य चिकित्सालयों को भी उनका सहयोग मिलता रहा। उनका कार्यक्षेत्र केवल गोरखपुर तक सीमित नहीं था। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय होम्योपैथिक संगोष्ठियों में भाग लेने के साथ उन्होंने विभिन्न देशों के रोगियों से भी चिकित्सकीय संपर्क स्थापित किया। यश भारती सम्मान से बढ़ा गोरखपुर का गौरव चिकित्सा क्षेत्र में उनके लंबे योगदान को उत्तर प्रदेश सरकार ने भी सम्मान दिया। वर्ष 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यकाल में डॉ. बनर्जी को प्रतिष्ठित यश भारती सम्मान से अलंकृत किया गया। यह सम्मान उनके दशकों के चिकित्सकीय अनुभव, समाजसेवा और स्वास्थ्य जागरूकता के प्रयासों की महत्वपूर्ण पहचान बना। संगठनात्मक स्तर पर भी उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही। वह होम्योपैथिक मेडिकल एसोसिएशन ऑफ इंडिया की गोरखपुर इकाई के लगभग एक दशक तक अध्यक्ष रहे। इसके अलावा गोरखपुर जिला होम्योपैथिक एसोसिएशन और होम्योपैथिक लीग से भी नेतृत्वकारी भूमिकाओं में जुड़े रहे। अंतरराष्ट्रीय होम्योपैथिक संगठनों और चिकित्सा पत्रिकाओं से उनका जुड़ाव उनके व्यापक अनुभव को दर्शाता है। भोजपुरी में समझाई स्वास्थ्य की बात, रेडियो से टीवी तक बनाई पहचान डॉ. बनर्जी की सबसे खास विशेषताओं में से एक थी कठिन चिकित्सा विषयों को आम लोगों की भाषा में समझाने की क्षमता। हिंदी, अंग्रेजी, बंगला और भोजपुरी पर उनकी अच्छी पकड़ थी। वह लैटिन भाषा से भी परिचित थे। उन्होंने समझा कि स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता तभी प्रभावी हो सकती है, जब संदेश लोगों तक उनकी अपनी भाषा में पहुंचे। आकाशवाणी गोरखपुर से भोजपुरी में प्रसारित उनकी स्वास्थ्य संबंधी वार्ताओं ने जनजागरूकता में योगदान दिया। दूरदर्शन और क्षेत्रीय टेलीविजन चैनलों पर भी उन्होंने स्वास्थ्य विषयों पर कार्यक्रम प्रस्तुत किए। रश्मि विजन चैनल पर उनके स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम ‘हेल्थ प्लस’ के 101 एपिसोड प्रसारित हुए। चिकित्सा पत्रिकाओं में लेखन और ‘चिकित्सा में अंधविश्वास’ जैसे विषयों पर जागरूकता फैलाने के उनके प्रयास भी उल्लेखनीय रहे। चिकित्सक ही नहीं, गोरखपुर की सांस्कृतिक विरासत के प्रहरी भी थे डॉ. राम रतन बनर्जी का व्यक्तित्व चिकित्सा तक सीमित नहीं था। गोरखपुर की ऐतिहासिक दुर्गाबाड़ी बंगाली समिति के संरक्षक के रूप में उन्होंने शहर की बंगाली सांस्कृतिक परंपरा से गहरा जुड़ाव बनाए रखा। सार्वजनिक दुर्गापूजा की पुरानी परंपरा, उसके इतिहास और सांस्कृतिक महत्व से जुड़ी जानकारियों को सामने लाने में भी उनकी रुचि रही। वह आर्यनगर रामलीला समिति सहित अनेक सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़े रहे। चिकित्सा और समाजसेवा के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सहेजने की उनकी प्रतिबद्धता उन्हें एक बहुआयामी व्यक्तित्व बनाती थी। हॉकी के मैदान से रंगमंच तक दिखाया हुनर डॉ. बनर्जी की प्रतिभा का दायरा खेल और कला तक फैला हुआ था। विद्यार्थी जीवन में वह हॉकी और फुटबॉल के अच्छे खिलाड़ी रहे। वर्ष 1951 से 1954 के बीच सेंट एंड्रयूज कॉलेज की हॉकी टीम की कप्तानी भी की। अभिनय और रंगमंच में उनकी विशेष रुचि थी। अंग्रेजी, हिंदी और बंगला नाटकों में अभिनय के लिए उन्हें विद्यार्थी जीवन में सम्मान मिला। वाद-विवाद प्रतियोगिताओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही। परिवार में भी आगे बढ़ रही चिकित्सा और सेवा की परंपरा डॉ. बनर्जी के परिवार में चिकित्सा सेवा की परंपरा अगली पीढ़ी तक पहुंची। उनकी बेटी डॉ. रचना बनर्जी और पुत्र डॉ. रूप कुमार बनर्जी भी होम्योपैथिक चिकित्सा के क्षेत्र से जुड़े प्रतिष्ठित चिकित्सक हैं। परिवार की यह परंपरा उनके जीवनभर के कार्य और चिकित्सा के प्रति समर्पण की निरंतरता को दर्शाती है। डॉ. राम रतन बनर्जी का निधन ऐसे समय में एक अनुभवी चिकित्सक और समाजसेवी के जाने का दुख लेकर आया है, जब उनके दशकों के अनुभव और जनजागरूकता के प्रयासों को याद किया जा रहा है। करीब 67 वर्षों की उनकी चिकित्सकीय यात्रा, जरूरतमंदों की मदद, स्वास्थ्य संबंधी संवाद और सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़ाव गोरखपुर की स्मृतियों का हिस्सा बने रहेंगे। उनकी पहचान सिर्फ यश भारती सम्मान पाने वाले चिकित्सक की नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तित्व की रहेगी जिसने चिकित्सा को सेवा, संवाद और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ने का प्रयास किया। डॉ. राम रतन बनर्जी भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके योगदान और उनसे जुड़ी स्मृतियों को लंबे समय तक याद किया जाता रहेगा।
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