सुख दुःख का पैमाना तो हमारी
आंतरिक प्रसन्नता ही होती है,
महत्व इसका नहीं होता है कि
हमने कब और कितना पाया है।
हमने कितनी तृप्ति का अनुभव
किया, यह अति महत्वपूर्ण है,
आज इंसान धन के कारण नहीं
अपने मन के कारण परेशान हैं।
सही सोच के अभाव है जिनमें,
उनका जीवन बोझ बन जाता है,
सुख साधन से मिली सफलता का
मूल्यांकन करना नहीं वुद्धिमत्ता है।
अक्सर संचय करने वाले रोते हैं,
और बांटने वालों को हँसते देखा है,
आंतरिक सूझ-वूझ के अभाव में,
धनवान व्यक्ति भी दुःखी होता है।
आंतरिक समझ वह दौलत है कि,
निर्धन व्यक्ति भी उतना ही अधिक
सुखी और संतुष्ट सदा हो सकता है,
धन से नही मन से धनी हो सकता है।
ईश्वर से प्रेम व आशीर्वाद बहुत बड़ी
दौलत होते हैं, ये जिसको मिलते हैं,
वही इंसान सबसे अधिक अमीर है,
और साथ साथ भाग्यशाली भी है।
आदित्य प्रेरणा से प्रेरणा मिलती है,
जिसके हृदय ईश्वर निवास होता है,
उससे अधिक सुखी नहीं कोई है,
यही संकल्प जीवन सुखी करता है।
डा० कर्नल आदि शंकर मिश्र,
‘आदित्य’
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