कंक्रीट की भूख में निगलते खेत—शहरी विस्तार से मिट रही खेती की जड़ें

(राष्ट्र की परम्परा)

तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण, औद्योगिक परियोजनाओं और भूमि अधिग्रहण की नीतियों ने भारत की खेती-किसानी पर गहरा असर डाला है। विकास की चमकदार निगाहों से दूर, गाँवों के खेत कंक्रीट की भूख में निगलते जा रहे हैं, और किसानों की मेहनत से पनपी भूमि धीरे-धीरे शहरों के फैलाव में तबाह हो रही है। कंक्रीट की भूख में निगलते खेत आज देश के कृषि भविष्य के सामने सबसे गंभीर चुनौती बन चुके हैं।

विकास की रफ्तार, लेकिन कीमत किसानों की?

सरकारें विकास को हाईवे, स्मार्ट सिटी, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर और हाउसिंग प्रोजेक्ट के रूप में दिखाती हैं। लेकिन इस विकास की रफ्तार में सबसे बड़ी कीमत किसान चुका रहा है। सदियों से जिस जमीन ने परिवारों को जीविका दी, वही जमीन अब मॉल, कॉलोनियों और फैक्ट्रियों के नाम पर अधिग्रहित की जा रही है।
कंक्रीट की भूख में निगलते खेत का दर्द इन गांवों में साफ दिखता है, जहां खेत सिकुड़ रहे हैं और किसान भी जल्द ही मजदूर बनने को मजबूर होते जा रहे हैं।

खेती की जमीन पर बढ़ता शहरी कब्ज़ा
भारत में कृषि भूमि तेजी से घट रही है। कारण—
हाउसिंग कॉलोनियों का तेजी से विस्तार
इंडस्ट्रियल एरिया और फैक्ट्री ज़ोन
नई सड़कें, एक्सप्रेसवे और हाईवे
स्मार्ट सिटी और बड़े शहरी प्रोजेक्ट
जमीन की कीमत के बढ़ने का लाभ भी किसान तक नहीं पहुंचता। जमीन बिक जाने के बाद उसके पास ना खेती बचती है, ना आय का कोई स्थिर साधन। कंक्रीट की भूख में निगलते खेत महज़ एक वाक्य नहीं, बल्कि किसानों की जमीनी हकीकत है।
किसानों का बढ़ता संकट: रोजगार खत्म, सम्मान कम।
खेती का खत्म होना सिर्फ जमीन खोना नहीं है, बल्कि यह पूरी पीढ़ी का भविष्य छिन जाने जैसा है।
स्थायी रोजगार नहीं मिलता,कौशल की कमी से मजदूरी का सहारा,आजीविका में अस्थिरता,कर्ज़ में बढ़ोतरी,सामाजिक और आर्थिक सम्मान में गिरावट।
शहरी विकास की इस दौड़ में किसान अवसर पाने के बजाय नए संघर्षों का सामना कर रहा है।

खाद्यान्न सुरक्षा पर गंभीर खतरा
यदि खेत लगातार कंक्रीट में बदलते रहे तो भारत की खाद्यान्न सुरक्षा पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।
कम होती कृषि भूमि का सीधा मतलब है—
अनाज उत्पादन में कमी,खाद्यान्न के दामों में बढ़ोतरी,भविष्य में खाद्यान्न संकट का जोखिम
कंक्रीट की भूख में निगलते खेत देश की भोजन व्यवस्था पर सीधा प्रहार कर रहे हैं।

भूमि अधिग्रहण: वादे बड़े, पारदर्शिता कम

कई किसानों को उचित मुआवजा या पुनर्वास नहीं मिलता। समस्याएँ—
जमीन का कम मूल्य निर्धारित होना,अधिग्रहण प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी,विस्थापन के बाद पुनर्वास न मिलना,रोजगार और स्किल ट्रेनिंग का अभाव,इन वजहों से किसान आर्थिक और सामाजिक रूप से और कमजोर होते जा रहे हैं।

समाधान: संतुलित विकास ही वास्तविक विकास

यदि देश को आगे बढ़ाना है, तो खेती और शहरीकरण के बीच संतुलन बनाना ज़रूरी है।
कृषि भूमि की कानूनी सुरक्षा बढ़ाई जाए।
अधिग्रहण प्रक्रिया पारदर्शी हो।
किसानों को वैकल्पिक रोजगार और स्किल ट्रेनिंग मिले।
आधुनिक खेती, सिंचाई और तकनीक का विस्तार हो।
वास्तविक विकास वही है जिसमें किसान शामिल हों, न कि पीछे छूट जाएँ।

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