प्राचीन विरासत घोषित करने के लिए राज्य सरकार के पास आवेदन करें….. बॉम्बे हाई कोर्ट
मुम्बई(राष्ट्र की परम्परा)
गिरगांव क्षेत्र में 200 साल से अधिक पुराने विट्ठल-रुक्मिणी मंदिर को प्राचीन या विरासत स्थल घोषित करने के लिए केंद्र या राज्य सरकार को आदेश देने की याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट में चार स्थानीय निवासियों द्वारा दायर की गई थी, जिस पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा है कि केंद्र या राज्य सरकार द्वारा प्राचीन विरासत स्थल घोषित नहीं किया गया है। इसलिए हम इस मंदिर की सुरक्षा का आदेश नहीं दे सकते।
मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति आरिफ डॉक्टर की पीठ ने निवासियों को राज्य सरकार के समक्ष यह आवेदन दायर करने के लिए एक पखवाड़े का समय दिया है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि केंद्र या राज्य सरकार के संबंधित विभाग को निवासियों द्वारा आवेदन किए जाने के छह महीने के भीतर इस पर निर्णय लेना चाहिए, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि जब तक यह फैसला नहीं आ जाता, तब तक मंदिर स्थल की स्थिति यथावत रखी जायेगी। हालाँकि, अदालत ने उपरोक्त आदेश पारित करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता निवासी मंदिर को प्राचीन विरासत स्थल का दर्जा देने की मांग करते हुए आवेदन दायर नहीं करते हैं, तो मंदिर स्थल पर निर्माण पर लगी रोक हटा दी जाएगी। बता दें कि
गिरगांव में विठ्ठल रुख्मिणी मंदिर की सुरक्षा और संरक्षण के बारे में चिंता व्यक्त करते हुए शैला गोरे और चार स्थानीय निवासियों ने याचिका दायर की थी। यह मंदिर 200 वर्ष से भी अधिक पुराना प्राचीन मंदिर है। इसलिए याचिकाकर्ताओं ने याचिका में कहा कि मंदिर की सुरक्षा और संरक्षण के लिए इसे ऐतिहासिक महत्व की प्राचीन विरासत स्थल घोषित करने की जरूरत है। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 49 के अनुसार, राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों या स्थानों या संरचनाओं को विरासत स्थल का दर्जा देना पर्याप्त नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि इन स्मारकों और विरासत स्थलों को विरूपण और विनाश से बचाना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।
सुनवाई के दौरान प्रस्तुत किए गए विभिन्न दस्तावेजों को देखते हुए अदालत ने आश्चर्य व्यक्त किया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा मंदिर स्थल को ऐतिहासिक और विरासत स्थलों और इलाकों की सूची में शामिल करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया।
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि गिरगांव में जहां मंदिर स्थित है वह जमीन कुछ निजी व्यक्तियों द्वारा पुनर्विकास कार्य के लिए खरीदी गई है, साथ ही मांग की गई कि मंदिर को संरक्षित करने के लिए राज्य सरकार और नगर निगम को एक विशेषज्ञ समिति बनाकर मंदिर के बारे में जांच करने का आदेश दिया जाए। इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं ने मंदिर के किसी भी नुकसान या गिरावट को रोकने के लिए मंदिर के दो किमी के दायरे में सभी निर्माण प्रक्रिया को रोकने का आदेश देने की भी मांग की थी। स्थानीय लोगों ने दावा किया कि 2007 में मंदिर के नवीनीकरण के कारण मंदिर की ऐतिहासिक और स्थापत्य स्थिति खो गई थी।
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