शिक्षा की उम्र में किताबों और कॉपियों की बजाय कूड़े के ढेर में अपने नसीब तलाशते मासूम बच्चे

उतरौला/बलरामपुर (राष्ट्र की परम्परा)। जहां एक ओर सरकारें ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और ‘शिक्षा का अधिकार’ जैसे नारे देकर बच्चों को बेहतर भविष्य देने की बात करती हैं, वहीं जमीनी हकीकत उससे कोसों दूर नजर आती है। उपरोक्त चित्र उतरौला नगर क्षेत्र का है, जहां दो मासूम बच्चे शिक्षा की उम्र में किताबों और कॉपियों की बजाय कूड़े के ढेर में अपने नसीब तलाशते दिखाई दे रहे हैं।बगल की दीवार पर साफ लिखा है – “शिक्षा का अधिकार – सर्व शिक्षा अभियान” और “स्वच्छ रखो अपना परिवेश”, लेकिन सच्चाई यह है कि न तो ये बच्चे स्कूल की दहलीज़ तक पहुंच पाए हैं, और न ही उनके परिवेश में कोई स्वच्छता या सुरक्षा की भावना है। इन बच्चों की उम्र लगभग 7 से 10 साल के बीच की प्रतीत हो रही है, जो हाथों में बोरी और खाली डिब्बे लेकर सड़कों की धूल फांकते फिर रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, और सुरक्षित बचपन का जो सपना संविधान और समाज ने देखा था, वह इन कूड़ा बीनते बच्चों के लिए आज भी एक छलावा है। ऐसे बच्चे अधिकतर मजदूर वर्ग, विस्थापित परिवारों या बेहद गरीब तबके से ताल्लुक रखते हैं। इनके माता-पिता स्वयं दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं। कुछ मामलों में तो माता-पिता स्वयं इन्हें कबाड़ बीनने के लिए मजबूर करते हैं ताकि दिन के अंत में थोड़ी आमदनी हो सके।
बुद्धिजीवियों का कहना है कि यह केवल गरीबी नहीं, सामाजिक उदासीनता और प्रशासनिक लापरवाही का भी परिणाम है। चित्र में यह भी देखा जा सकता है कि जहां ये बच्चे कूड़ा बीन रहे हैं, वहां से महज कुछ कदम की दूरी पर विद्यालय भवन स्थित है। यानी स्कूल हैं, लेकिन बच्चा स्कूल में नहीं है – इसका जिम्मेदार कौन? क्या विद्यालय प्रशासन ने कभी यह प्रयास किया कि आसपास के सभी बच्चों को स्कूल लाया जाए? क्या आदर्श नगर पालिका, बाल कल्याण विभाग या चाइल्ड हेल्पलाइन ने इन्हें ट्रैक करने का कोई प्रयास किया? दीवार पर लिखा “स्वच्छ रखो अपना परिवेश” एक विडंबना बन चुका है। न तो गलियों की सफाई दिख रही है, और न ही बच्चों के तन-मन का भविष्य। जो उम्र खेलने, पढ़ने और सपने देखने की होती है, वह उम्र आज कूड़े की बदबू, नंगे पैर और भूखे पेट के हवाले है।अब विचारणीय प्रश्न ये है कि क्या इन बच्चों का कोई रजिस्ट्रेशन कभी स्कूल में हुआ था?
क्या नगर क्षेत्र के जिम्मेदार अधिकारी बच्चों की हालत से अनभिज्ञ हैं? क्या बाल अधिकार आयोग और जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने कभी ऐसे बच्चों की सूची बनाई? यह सिर्फ एक तस्वीर नहीं, एक समाज का आईना है उतरौला की यह तस्वीर सिर्फ दो बच्चों की गरीबी नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता, समाज की चुप्पी और शिक्षा की अनदेखी की चीखती गवाही है। जरूरत है कि ऐसे बच्चों की पहचान कर उन्हें स्कूल से जोड़ा जाए। परिवारों को आर्थिक सहायता और मनरेगा जैसी योजनाओं से जोड़ा जाए। बालश्रम के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो और चाइल्ड हेल्पलाइन सक्रिय हो।

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