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विकास के शोर में दबती आम जनता की आवाज, चमकते प्रोजेक्ट्स के बीच अनसुनी जिंदगियां विकास के दावों और आम आदमी की हकीकत पर एक गंभीर सवाल

डॉ. सतीश पाण्डेय

महराजगंज (राष्ट्र की परंपरा)।विकास किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल उद्देश्य माना जाता है। सड़कें, पुल, ऊंची इमारतें, स्मार्ट सिटी और बड़े-बड़े प्रोजेक्ट आज विकास के प्रतीक बन चुके हैं। हर मंच से इन्हीं उपलब्धियों का बखान किया जाता है, लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि क्या यह विकास वास्तव में आम जनता की जिंदगी को सरल, सुरक्षित और सम्मानजनक बना पा रहा है, या फिर यह केवल कागजी रिपोर्टों, विज्ञापनों और राजनीतिक शोर तक सीमित होकर रह गया है।आज आम नागरिक महंगाई की मार, बेरोजगारी की चिंता, शिक्षा और स्वास्थ्य की दुश्वारियों तथा बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है। शहरों में जहां एक ओर चमचमाती इमारतें और आधुनिक सुविधाएं दिखाई देती हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हीं शहरों की झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लोग साफ पानी, स्वच्छता और इलाज जैसी मूल जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। गांवों की हालत भी इससे अलग नहीं है। आजादी के दशकों बाद भी कई ग्रामीण इलाकों में पक्की सड़क, नियमित बिजली, शुद्ध पेयजल और स्थायी रोजगार अब भी अधूरे सपने बने हुए हैं।बेरोजगारी ने सबसे अधिक युवा वर्ग को प्रभावित किया है। डिग्री और तकनीकी योग्यता होने के बावजूद युवाओं को अस्थायी काम करने या लंबे समय तक बेरोजगार रहने की मजबूरी झेलनी पड़ रही है। किसान बढ़ती लागत और फसल के उचित मूल्य के बीच फंसा हुआ है। किसानों की आय बढ़ाने के सरकारी दावे कागजों में प्रभावी नजर आते हैं, लेकिन खेतों में मेहनत करने वाले किसान की स्थिति आज भी असुरक्षित बनी हुई है। मजदूर वर्ग को सम्मानजनक मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा और सुरक्षित कार्यस्थल का अब भी इंतजार है।स्वास्थ्य सेवाएं लगातार महंगी होती जा रही हैं। निजी अस्पतालों में इलाज आम आदमी की पहुंच से बाहर होता जा रहा है, जबकि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों, दवाइयों और संसाधनों की कमी मरीजों की परेशानियां बढ़ा रही है। शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन ग्रामीण और गरीब तबके के बच्चों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा आज भी नहीं पहुंच पा रही है। स्कूलों में शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव भविष्य की नींव को कमजोर कर रहा है।लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता की आवाज होती है, लेकिन विडंबना यह है कि यही आवाज विकास के शोर में दबती जा रही है। योजनाएं अक्सर ऊपर से नीचे थोप दी जाती हैं, जबकि वास्तविक जरूरतें नीचे से ऊपर तय होनी चाहिए। आम आदमी की समस्याएं फाइलों और बैठकों तक सिमट जाती हैं और समाधान घोषणाओं तक ही सीमित रह जाते हैं।विकास तभी सार्थक माना जाएगा जब उसका लाभ समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचे। केवल भौतिक ढांचे का विस्तार ही विकास नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय, रोजगार के अवसर, सुलभ शिक्षा और सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं भी उतनी ही आवश्यक हैं। नीति-निर्माताओं को यह समझना होगा कि वास्तविक प्रगति वही है, जिसमें आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी में सकारात्मक और स्थायी बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे।यदि समय रहते विकास की दिशा को जनता की वास्तविक जरूरतों से नहीं जोड़ा गया, तो विकास का शोर और तेज होता जाएगा, लेकिन आम जनता की आवाज और कमजोर होती चली जाएगी। यही स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित हो सकती है।

rkpnews@desk

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