आईसीएमआर ने दी मंजूरी, नैनोटेक्नोलॉजी आधारित नई दवा विकसित करने पर होगा शोध; रोग से त्वचा पर पड़ते हैं गंभीर प्रभाव
लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू), लखनऊ को पोस्ट-कालाजार डर्मल लीशमैनियासिस (पीकेडीएल) के उपचार के लिए भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर), नई दिल्ली से पांच करोड़ रुपये की सहयोगात्मक शोध परियोजना मिली है। इस परियोजना के तहत नैनोटेक्नोलॉजी आधारित नवीन औषधीय फॉर्मूलेशन विकसित करने और उसके नैदानिक मूल्यांकन पर काम किया जाएगा।
पीकेडीएल कालाजार से जुड़ी एक त्वचा संबंधी बीमारी है, जो आमतौर पर काला-अजार के उपचार के बाद सामने आ सकती है। इस रोग में त्वचा पर चकत्ते, सपाट या उभरे हुए दाने और गांठें विकसित हो सकती हैं। ये बदलाव चेहरे, हाथों और शरीर के अन्य हिस्सों पर दिखाई दे सकते हैं। गंभीर मामलों में त्वचा पर होने वाले स्पष्ट बदलाव व्यक्ति के सामाजिक जीवन, आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकते हैं। इसके अलावा, त्वचा में परजीवी बने रहने के कारण संक्रमित व्यक्ति रोग के प्रसार की कड़ी का हिस्सा हो सकता है। इसलिए पीकेडीएल की समय पर पहचान, प्रभावी उपचार और रोग नियंत्रण की दृष्टि से इसका प्रबंधन महत्वपूर्ण है।
इस परियोजना का उद्देश्य पीकेडीएल के उपचार के लिए नैनोटेक्नोलॉजी आधारित नवीन औषधीय फॉर्मूलेशन विकसित करना है, ताकि इस रोग के उपचार की दिशा में नई संभावनाएं तलाश की जा सकें। शोध के अंतर्गत विकसित फॉर्मूलेशन का नैदानिक मूल्यांकन भी किया जाएगा।
यह परियोजना बीबीएयू के स्कूल ऑफ फार्मास्यूटिकल साइंसेज, काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के विज्ञान संस्थान और आईसीएमआर-आरएमआरआईएमएस, पटना के सहयोग से संचालित होगी। बीबीएयू की ओर से स्कूल ऑफ फार्मास्यूटिकल साइंसेज के डीन प्रो. पीएस राजिनीकांत परियोजना के प्रधान अन्वेषक (पीआई) होंगे। वहीं, बीएचयू के विज्ञान संस्थान के जैव रसायन विभाग के प्रो. राकेश कुमार सिंह इस शोध में सहयोग देंगे।
इस पहल के अंतर्गत बीबीएयू और बीएचयू में आईसीएमआर-आरएमआरआईएमएस, पटना के सहयोग से संयुक्त अनुसंधान केंद्र (सेंटर फॉर कोलैबोरेटिव रिसर्च-सीसीआर) स्थापित किया गया है। इस केंद्र के माध्यम से नवीन औषधीय फॉर्मूलेशन के विकास, उनके नैदानिक मूल्यांकन और पीकेडीएल के प्रभावी उपचार की संभावनाओं पर संयुक्त रूप से शोध किया जाएगा।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने इस उपलब्धि पर प्रो. पीएस राजिनीकांत को बधाई एवं शुभकामनाएं दीं। उन्होंने इसे विश्वविद्यालय के लिए गौरव का विषय बताया। विभाग के शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भी प्रो. राजिनीकांत को इस उपलब्धि पर बधाई दी।
