850 सीटों की लोकसभा: प्रतिनिधित्व बढ़ेगा या संतुलन बिगड़ेगा?

महिला आरक्षण से आगे बढ़ी बहस: परिसीमन के साथ जुड़ते ही ‘सत्ता संतुलन’ का राष्ट्रीय सवाल बना मुद्दा


भारत की संसदीय राजनीति इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहां महिला सशक्तिकरण के ऐतिहासिक प्रयास के साथ-साथ क्षेत्रीय संतुलन और राजनीतिक शक्ति के पुनर्वितरण को लेकर गहरी बहस छिड़ गई है। विशेष संसद सत्र (16-18 अप्रैल 2026) में पेश किए गए महिला आरक्षण, परिसीमन और केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े तीन महत्वपूर्ण विधेयकों ने देश की राजनीति को नई दिशा में मोड़ दिया है।
महिला आरक्षण से संबंधित संवैधानिक संशोधन विधेयक 2026 के तहत लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है, जिसमें लगभग 272 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी। यह कदम जहां लोकतंत्र को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में एक बड़ा प्रयास है, वहीं परिसीमन के साथ इसके जुड़ने से राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है।
संसद में इस विधेयक को ध्वनि मत से पारित करने की कोशिश विफल रही और वोटिंग करानी पड़ी। परिणामस्वरूप सरकार को 251 सांसदों का समर्थन मिला, जबकि 185 सांसदों ने विरोध किया। यह आंकड़ा साफ संकेत देता है कि यह मुद्दा केवल नीतिगत नहीं बल्कि राजनीतिक और क्षेत्रीय विभाजन का केंद्र बन चुका है।
विवाद का मूल बिंदु महिला आरक्षण नहीं, बल्कि उसे परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ना है। विपक्ष स्पष्ट रूप से कह रहा है कि वह महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के पक्ष में है, लेकिन इसे जनगणना और परिसीमन के बाद लागू करने की शर्त का विरोध करता है। विपक्ष इसे एक ‘डिले टैक्टिक’ मानता है, जबकि सरकार इसे संरचनात्मक सुधार का आवश्यक हिस्सा बताती है।

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परिसीमन का गणित इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू बन गया है। 1971 की जनगणना के आधार पर लंबे समय तक सीटों का निर्धारण स्थिर रखा गया था ताकि जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को नुकसान न हो। 1976 में यह तय किया गया कि 2026 तक परिसीमन नहीं होगा। अब जब यह प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है, तो जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व का सवाल खड़ा हो गया है।
यदि सीटों का पुनर्वितरण जनसंख्या के आधार पर होता है, तो उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को अधिक सीटें मिलेंगी, जबकि तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक जैसे दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी घट सकती है। यही वह बिंदु है जहां यह बहस ‘महिला सशक्तिकरण’ से आगे बढ़कर ‘उत्तर बनाम दक्षिण’ के राजनीतिक विमर्श में बदल गई है।
दक्षिण भारत के राज्यों का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है, और अब उन्हें कम प्रतिनिधित्व देकर ‘सजा’ दी जा रही है। उनका मानना है कि इससे संसद में उनकी आवाज कमजोर होगी और संघीय ढांचा प्रभावित हो सकता है।

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दूसरी ओर, सरकार का पक्ष यह है कि सीटों में वृद्धि सभी राज्यों के लिए समान अनुपात में की जाएगी और किसी राज्य का वर्तमान प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा। सरकार का दावा है कि परिसीमन आयोग निष्पक्ष तरीके से काम करेगा और यह प्रक्रिया केवल जनसंख्या ही नहीं बल्कि प्रशासनिक संतुलन को भी ध्यान में रखकर की जाएगी।
विपक्ष की एक बड़ी आशंका यह भी है कि यह पूरी प्रक्रिया राजनीतिक लाभ के लिए तैयार की गई रणनीति हो सकती है। उनका कहना है कि जिन राज्यों में सत्ताधारी दल की मजबूत पकड़ है, वहां सीटें बढ़ने से संसद में सत्ता संतुलन एकतरफा हो सकता है।
जनगणना का मुद्दा भी इस विवाद में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। विपक्ष का कहना है कि बिना नई जनगणना के परिसीमन करना तर्कसंगत नहीं है। वहीं सरकार ने संविधान में संशोधन कर यह प्रावधान किया है कि संसद जिस जनगणना को मान्यता देगी, उसी के आधार पर परिसीमन किया जा सकेगा, जिससे लचीलापन तो बढ़ता है लेकिन पारदर्शिता पर सवाल भी उठते हैं।

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लोकसभा का प्रस्तावित विस्तार भी अपने आप में ऐतिहासिक है। 850 सीटों वाली लोकसभा दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्था को और विशाल बना देगी। इससे प्रतिनिधित्व बढ़ेगा, लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया जटिल भी हो सकती है।
अंततः यह पूरा मुद्दा भारतीय लोकतंत्र के लिए एक दोधारी तलवार जैसा है। एक ओर यह महिलाओं को राजनीतिक मुख्यधारा में लाने का अवसर देता है, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय असंतुलन और राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ाने का खतरा भी पैदा करता है। यह केवल एक विधेयक नहीं, बल्कि भारत के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करने वाला निर्णय है।
यदि इसे पारदर्शिता, संतुलन और सहमति के साथ लागू किया गया, तो यह लोकतंत्र को मजबूत करेगा। लेकिन यदि इसमें राजनीतिक हित हावी रहे, तो यह उत्तर-दक्षिण विभाजन को और गहरा कर सकता है।
— संकलनकर्ता: एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया (महाराष्ट्र)

Editor CP pandey

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