झुग्गी बस्ती की समस्या से निकला बड़ा समाधान! 20 वर्षीय पीयूष ने बनाया सस्ता अपशिष्ट जल शोधन सिस्टम
नयी दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा)। बेहतर भविष्य की तलाश में बिहार के मधुबनी से मुंबई पहुंचे 20 वर्षीय पीयूष झा ने अपनी बस्ती के आसपास जमा गंदे पानी और उससे पैदा होने वाली बीमारियों के खतरे को एक बड़ी चुनौती के रूप में देखा। इसी अनुभव ने उन्हें ऐसा नवाचार विकसित करने के लिए प्रेरित किया, जो अब जल प्रदूषण से निपटने की दिशा में उम्मीद जगाता है।
पीयूष ने एक विकेंद्रीकृत और मॉड्यूलर अपशिष्ट जल शोधन प्रणाली विकसित की है। इसका उद्देश्य उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट जल को अपेक्षाकृत कम लागत में उपचारित करना और इसके लिए भारी-भरकम बुनियादी ढांचे पर निर्भरता घटाना है।
उनके इस नवाचार को भारत में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के उद्यमिता कार्यक्रम ‘यूथ को:लैब नेशनल इनोवेशन चैलेंज’ के तहत पहचान मिली है। विश्व नदी दिवस के अवसर पर पीयूष ने बताया कि उनका प्रयास बिना शोधित औद्योगिक अपशिष्ट जल को जल स्रोतों तक पहुंचने से रोकने की दिशा में है।
औद्योगिक अपशिष्ट जल बड़ी चुनौती
पीयूष के मुताबिक भारत में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में अपशिष्ट जल उत्पन्न होता है, लेकिन उसका एक सीमित हिस्सा ही उपचारित हो पाता है। उनका समाधान खास तौर पर उन उद्योगों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, जहां जैविक रूप से विघटित होने वाला कचरा बड़ी मात्रा में निकलता है।
इस तकनीक का संभावित उपयोग कपड़ा, चमड़ा, खाद्य एवं पेय पदार्थ, डिस्टिलरी, कागज एवं लुगदी और चीनी उद्योग जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है।
पीयूष का दावा है कि उनकी प्रणाली में अपशिष्ट जल के उपचार के लिए अतिरिक्त रासायनिक पदार्थों और अत्यधिक भारी बुनियादी ढांचे की जरूरत नहीं पड़ती। तकनीक सूक्ष्मजीवों की मदद से जैविक कचरे को विघटित करने की प्रक्रिया पर आधारित है। इस प्रक्रिया से बिजली उत्पादन की संभावना भी जुड़ी है।
20 लाख की जगह 5 से 7 लाख रुपये का समाधान
पीयूष के अनुसार छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए जल शोधन की लागत एक बड़ी चुनौती है। उनका प्री-ट्रीटमेंट समाधान इस लागत को कम करने का प्रयास करता है। उनके मुताबिक जहां पारंपरिक व्यवस्था में किसी उद्योग को जल उपचार पर करीब 20 लाख रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं, वहीं उनका समाधान इस खर्च को लगभग 5 से 7 लाख रुपये तक लाने में मदद कर सकता है।
उनका मानना है कि यदि छोटे और मध्यम उद्योगों को किफायती जल शोधन तकनीक उपलब्ध हो, तो जल स्रोतों में अनुपचारित या प्रदूषित औद्योगिक पानी छोड़े जाने की संभावना कम की जा सकती है। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ उद्योगों के लिए आर्थिक लाभ की संभावना भी बनती है।
सेकेंड हैंड लैपटॉप से शुरू हुआ सफर
पीयूष ने बताया कि कोविड-19 महामारी के दौरान उन्हें एक सेकेंड हैंड लैपटॉप मिला। इसी संसाधन के सहारे उन्होंने जल उपचार से जुड़े विषयों पर काम और प्रयोग शुरू किए। खास बात यह है कि उनके पास जल उपचार इंजीनियरिंग की कोई औपचारिक डिग्री नहीं है।
उन्होंने एमएचटी-सीईटी में 98 प्रतिशत अंक हासिल किए थे और मुंबई के डीजी सांघवी कॉलेज में पढ़ाई शुरू की थी। बाद में उन्होंने अपनी पढ़ाई बीच में छोड़कर स्टार्टअप और इस तकनीकी समाधान को विकसित करने पर ध्यान केंद्रित किया।
यूएनडीपी से मिला मार्गदर्शन और नेटवर्क
पीयूष ने बताया कि यह पहल अकेले उनके प्रयास का परिणाम नहीं है। विभिन्न संगठनों, गैर-सरकारी संस्थाओं और इनक्यूबेटरों से उन्हें सहयोग मिला। इनमें यूएनडीपी, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और मर्सिडीज-बेंज फेलोशिप कार्यक्रम शामिल हैं।
यूएनडीपी इंडिया के ‘यूथ को:लैब’ कार्यक्रम से उन्हें उद्योग विशेषज्ञों का मार्गदर्शन, निवेशकों से संपर्क और तीन महीने के प्रशिक्षण कार्यक्रम का अवसर मिला। प्रतियोगिता में विजेता नहीं बनने वाले प्रतिभागियों को भी उद्योग जगत के विशेषज्ञों से सीखने और नेटवर्क बनाने का अवसर दिया गया।
पीयूष को हैदराबाद में आयोजित चार दिवसीय बूटकैंप में भी आमंत्रित किया गया, जहां उन्हें दो महत्वपूर्ण साझेदार मिले। इनमें एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के साथ संभावित साझेदारी भी शामिल है।
एक सामान्य बस्ती में गंदे पानी की समस्या देखकर शुरू हुआ यह सफर अब औद्योगिक जल प्रदूषण जैसी बड़ी चुनौती के समाधान की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
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