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1928: जब भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने देश के लिए दिया सर्वोच्च बलिदान


(लेख – राष्ट्र की परम्परा डेस्क)

क्रांति की ज्वाला जिसने इतिहास बदल दिया
भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास बलिदानों की अमर गाथाओं से भरा हुआ है। परंतु कुछ बलिदान ऐसे हैं जिन्होंने पूरे देश की आत्मा को झकझोर दिया, जिसने गुलामी की जंजीरों को तोड़ने का हौसला दिया। वर्ष 1928 का समय भी ऐसा ही था—जब देश के तीन अमर सपूतों भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अपने प्राणों की आहुति देकर आज़ादी की ज्वाला को और प्रज्वलित किया। इन तीनों वीरों ने न केवल ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाई, बल्कि करोड़ों भारतीयों के हृदय में स्वतंत्रता का अग्निदीप जलाया।
लाला लाजपत राय की शहादत और प्रतिशोध की चिंगारी
30 अक्टूबर 1928 को जब लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध में विशाल प्रदर्शन निकाला गया, तो अग्रणी स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय उस विरोध के नेतृत्व में थे। अंग्रेजों की पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर बेरहमी से लाठीचार्ज किया। लाठीचार्ज के दौरान सुपरिंटेंडेंट जेम्स ए. स्कॉट ने स्वयं लाला लाजपत राय पर प्रहार किया, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए और 17 नवम्बर 1928 को उनका निधन हो गया।
इस घटना ने नौजवान क्रांतिकारियों के भीतर अग्नि भर दी। भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद और उनके साथियों ने निर्णय लिया कि इस अत्याचार का प्रतिशोध लिया जाएगा। यह प्रतिशोध सिर्फ़ एक अधिकारी के विरुद्ध नहीं, बल्कि पूरे ब्रिटिश शासन के अहंकार के विरुद्ध था।

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गलत पहचान में हुआ लाहौर का ऐतिहासिक घटना
17 दिसंबर 1928 को योजना के अनुसार जेम्स ए. स्कॉट को मारने के लिए भगत सिंह और राजगुरु लाहौर पहुँचे। परंतु पहचान में चूक हो गई और उन्होंने असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट जॉन सॉन्डर्स को गोली मार दी। इस घटना से ब्रिटिश शासन हिल गया। सॉन्डर्स की हत्या के बाद भगत सिंह और राजगुरु फरार हो गए। इस पूरी योजना में सुखदेव की भूमिका रणनीतिक और निर्णायक थी — उन्होंने भगत सिंह और राजगुरु को मार्गदर्शन दिया और गुप्त संगठन हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) की कार्ययोजना तय की।
भगत सिंह: विचारों से बना अमर क्रांतिकारी
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को लायलपुर (अब पाकिस्तान में) के बंगा गाँव में हुआ था। बचपन से ही उनके मन में देशभक्ति की भावना प्रबल थी। 1919 के जालियांवाला बाग हत्याकांड ने उनके मन को झकझोर दिया। किशोर अवस्था में ही उन्होंने ‘क्रांति’ को अपनी साधना बना लिया। वे मानते थे कि स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और मानसिक मुक्ति का भी प्रतीक है।
उनकी वैचारिक गहराई इतनी थी कि जेल में रहते हुए भी उन्होंने किताबें पढ़ीं, लेख लिखे और युवाओं को जगाने का कार्य किया। भगत सिंह का कहना था –
“क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।”
सुखदेव: संगठन के मस्तिष्क, विचार के योद्धा
सुखदेव थापर का जन्म 15 मई 1907 को लाहौर में हुआ था। वे भगत सिंह के सहपाठी और गहरे मित्र थे। लाहौर नेशनल कॉलेज, जिसे लाला लाजपत राय ने स्थापित किया था, में पढ़ते समय ही उन्होंने क्रांतिकारी संगठन में सक्रिय भूमिका निभाई। वे नौजवान भारत सभा के प्रमुख आयोजकों में से थे।
सुखदेव ने युवाओं को संगठित कर उन्हें स्वदेश प्रेम और त्याग की भावना से भरने का बीड़ा उठाया। उनके अंदर एक योजनाकार, एक विचारक और एक अनुशासित सेनानी था। उन्होंने ही भगत सिंह को ‘सामूहिक आंदोलन’ के महत्व का बोध कराया।
राजगुरु: निर्भीक योद्धा और साहस की प्रतिमूर्ति
राजगुरु का पूरा नाम शिवराम हरि राजगुरु था। उनका जन्म 24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र के पुणे जिले के खेड़ में हुआ। वे जन्मजात साहसी और तेजस्वी थे। उनकी निशानेबाजी इतनी सटीक थी कि साथी उन्हें “शार्प शूटर” कहते थे।

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राजगुरु ने कम उम्र में ही हथियार चलाने की कला में निपुणता प्राप्त कर ली थी। जब भी किसी जोखिम भरे अभियान की बात होती, वे सबसे पहले आगे बढ़ते। भगत सिंह और सुखदेव के साथ उनकी त्रयी आज भी भारत के क्रांतिकारी इतिहास की सबसे प्रेरक संगति मानी जाती है।
लाहौर षड्यंत्र मामला और न्याय का नाटक
सॉन्डर्स हत्याकांड के बाद ब्रिटिश पुलिस ने चारों ओर तलाशी अभियान शुरू किया। क्रांतिकारी गुप्त रूप से भूमिगत हो गए। लेकिन 1929 में सेंट्रल असेम्बली बम कांड के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त पकड़े गए। उनके मुकदमे के दौरान भगत सिंह ने अदालत को अपने विचारों के मंच के रूप में इस्तेमाल किया। उन्होंने ब्रिटिश न्याय-व्यवस्था की पोल खोली और कहा कि यह मुकदमा न्याय नहीं, बल्कि औपनिवेशिक प्रतिशोध है।
1929 में शुरू हुआ लाहौर षड्यंत्र केस अंततः भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के लिए मृत्युदंड के निर्णय पर समाप्त हुआ। न्याय के नाम पर औपनिवेशिक अत्याचार हुआ। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपीलों और विरोधों के बावजूद 23 मार्च 1931 को तीनों को फाँसी दे दी गई।
23 मार्च 1931: जब धरती रो पड़ी
लाहौर सेंट्रल जेल के भीतर जब 23 मार्च 1931 की रात को तीनों वीर फाँसी पर चढ़े, तब देश के कोने-कोने में मातम छा गया। जेल की दीवारों के भीतर से उठती हुई वह गूँज “इंकलाब ज़िंदाबाद” आज भी देशभक्तों के हृदय में गूँजती है।
ब्रिटिश हुकूमत को डर था कि उनके शवों के अंतिम दर्शन से जनक्रांति भड़क जाएगी, इसलिए उन्हें रातोंरात फिरोज़पुर के पास सतलुज नदी के किनारे गुप्त रूप से जला दिया गया। परंतु उनके विचारों की ज्वाला बुझी नहीं — वह आज भी हर पीढ़ी को जगाती है।
इन तीनों का बलिदान क्यों अमर है
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का बलिदान केवल ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिशोध नहीं था, बल्कि यह एक विचार क्रांति थी। उन्होंने भारत की स्वतंत्रता को केवल राजनैतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि जनचेतना के रूप में देखा।
उन्होंने सिखाया कि स्वतंत्रता का अर्थ है —
“विचारों की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की भावना।”
आज भी जब देश स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस मनाता है, तो इन तीनों अमर शहीदों के नाम लिए बिना उत्सव अधूरा लगता है। उनके नाम से देश का हर नौजवान साहस, आदर्श और त्याग का अर्थ सीखता है।
विचारों की मशाल आज भी जलती है
समय भले ही बदल गया हो, पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उन्होंने जो सपना देखा था — एक न्यायपूर्ण, समानता आधारित और आत्मनिर्भर भारत का — वह आज भी हमारे लिए प्रेरणा है।
उनका बलिदान केवल इतिहास का अध्याय नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का वह अनश्वर गीत है, जो हर पीढ़ी को यह याद दिलाता है —
“क्रांतिकारी मरते नहीं, वे युगों तक विचारों में जीवित रहते हैं।”

Karan Pandey

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