जब अपने ही पराएं हो जाएं —जीवन की सबसे कड़वी हकीकत

कैलाश सिंह

गुमा थी गुलशन में बहार देखेंगे,अपनी आंखों में अपने बच्चों का प्यार देखेंगे,क्या खबर थी ऐ मालिक…
कि अपने ही आंगन में अपनी मजार देखेंगे।

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। मनुष्य जीवन प्रकृति की अनमोल देन है। जन्म लेते ही मृत्यु का टिकट तय हो जाता है, परंतु इस सत्य को जानकर भी इंसान इतना मगरूर हो जाता है कि मिट्टी की इस देह के भीतर बसाए गए अहंकार को ही जीवन का सत्य समझ बैठता है।
स्वार्थ की इस बस्ती में अपनापन सिर्फ जरूरतों तक सीमित है, जो लगाव दिखता है, वह अवसरों और हसरतों का सौदा भर है।उपेक्षा की आग में झुलसते माता-पिता
संयुक्त परिवार अब इतिहास की किताबों में सिमट रहे हैं।बुजुर्ग माता -पिता, जिनकी उंगली थामकर कभी बच्चें चलना सीखे थे, आज उन्हीं की चौखट पर तिरस्कार का बोझ रख दिया जाता है।सोशल मीडिया पर पढ़ी एक सच्ची कहानी मन को भीतर तक दहला गई—पुलिस विभाग का एक बड़ा अफसर, जिसने दशकों तक खाकी की शान बनाए रखी,वहीआज वृद्धाश्रम की चार दीवारों में गुमनामी की सांसें गिन रहा है।कल तक जिसकी आवाज पर अपराधियों में खौफ दौड़ जाता था,आज वह अपनी ही औलादों की बेरुखी से डरकर तन्हाई में जी रहा है।जब उसने दर्द भरी पंक्तियां सुनाईं, आंखों से बहते आंसुओं ने बता दिया अहंकार के पहाड़ जितने भी ऊंचे हों,अन्त में ढह कर गिर ही जाते हैं। समाज की विडंबना बढ़ती शराब खोरी है।बच्चें अभिभावक सब आधुनिकता की आड़ में ऐसी लतों में बंधते जा रहे हैं, जहां घर में शांति की जगह रोज का कोलाहल बसता जा रहा है।जब परिवार नशे की गिरफ्त में आ जाए,
तब संस्कारों की नींव अपने-आप दरकने लगती है। पद, प्रतिष्ठा और पैसा—सब एक दिन साथ छोड़ देते हैं
जब नौकरी है, नाम है, शोहरत है,तो दुनिया छोटी और लोग अधीन लगते हैं।परंतु जैसे ही कुर्सी छिनती है,अहंकार की दीवारें ऐसे टूटती हैं कि इंसान खुद अपनी पहचान खोजने लगता है। वहीं लोग, जिनके लिए जीवन भर धन- संपत्ति कमाई,अचानक समय बदलते ही नजरें फेर लेते हैं।जीवन एक पड़ाव मात्र, अंतिम सफर अकेले का ही होता है अंत में साथ जाते हैं तो सिर्फ कर्म, चरित्र और किए गए उपकार। न बेटा,न बहू, न परिवार मालिक की चौखट पर हर व्यक्ति अकेला खड़ा होता है।इस माया-जगत में जो कुछ चमकता है,वह स्थायी नहीं…जो स्थायी है, वह दिखाई नहीं देता। एक अंतिम संदेश –संभल जाओ,कल बहुत देर हो सकती है। गरीब,असहाय,पीड़ित और बीमारों की मदद करें। माता-पिता की सेवा को बोझ नहीं, वरदान समझें।अहंकार छोड़कर विनम्रता अपनाएं।जीवन को सिर्फ धन-संपत्ति में मत तौलें।सच्ची विरासत वही है,जो इंसानियत से छोड़ी जाती है। वरना एक दिन यह कटु सत्य सामने खड़ा मिलेगा—इस भरी दुनिया में भी,अंततः इंसान अकेला ही होता है।

rkpnews@desk

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